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अँधियारे गलियारे में चलते हुए लतिका ठिठक गई। दीवार का सहारा लेकर उसने लैंप की बत्ती बढ़ा दी। सीढ़ियों पर उसकी छाया एक बेडौल फटी-फटी आकृति खींचने लगी। सात नंबर कमरे से लड़कियों की बातचीत और हँसी-ठहाकों का स्वर अभी तक आ रहा था। लतिका ने दरवाज़ा खटखटाया। शोर अचानक बंद हो गया।
‘कौन है?’

लतिका चुपचाप खड़ी रही। कमरे में कुछ देर तक घुसुर-पुसुर होती रही, फिर दरवाज़े की चटखनी के खुलने का स्वर आया। लतिका कमरे की देहरी से कुछ आगे बढ़ी, लैंप की झपकती लौ में लड़कियों के चेहरे सिनेमा के पर्दे पर ठहरे हुए क्लोज़-अप की भाँति उभरने लगे।
‘कमरे में अँधेरा क्यों कर रखा है?’ लतिका के स्वर में हल्की-सी झिड़क का आभास था।

‘लैंप में तेल ही ख़त्म हो गया, मैडम!’
यह सुधा का कमरा था, इसलिए उसे ही उत्तर देना पड़ा। होस्टल में शायद वह सबसे अधिक लोकप्रिय थी। क्योंकि सदा छुट्टी के समय या रात के डिनर के बाद आस-पास के कमरों में रहने वाली लड़कियों का जमघट उसी के कमरे में लग जाता था। देर तक गपशप, हँसी-मज़ाक़ चलता रहता।

‘तेल के लिए करीमुद्दीन से क्यों नहीं कहा?’
‘कितनी बार कहा मैडम, लेकिन उसे याद रहे तब तो!’

कमरे में हँसी की फुहार एक कोने में दूसरे कोने तक फैल गई। लतिका के कमरे में आने से अनुशासन की जो घुटन घिर आई थी, वह अचानक बह गई। करीमुद्दीन होस्टल का नौकर था। उसके आलस और काम में टालमटोल करने के क़िस्से होस्टल की लड़कियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे।
लतिका को हठात् कुछ स्मरण हो आया। अँधेरे में लैंप घुमाते हुए चारों ओर निगाहें दौड़ाई। कमरे में चारों ओर घेरा बनाकर वे बैठी थी—पास-पास एक-दूसरे से सटकर। सबके चेहरे परिचित थे, किंतु लैंप के पीले मद्धिम प्रकाश में मानो कुछ बदल गया था, या जैसे वह उन्हें पहली बार देख रही थी।

‘जूली, अब तक तुम इस ब्लॉक में क्या कर रही हो?’
जूली खिड़की के पास पलंग के सिरहाने बैठी थी। उसने चुपचाप आँखें नीची कर ली। लैंप का प्रकाश चारों ओर से सिमटकर अब केवल उसके चेहरे पर गिर रहा था।

‘नाइट-रजिस्टर पर दस्तख़त कर दिए?’
‘हाँ, मैडम।’

‘फिर...?’ लतिका का स्वर कड़ा हो आया। जूली सकुचाकर खिड़की से बाहर देखने लगी।
जब से लतिका इस स्कूल में आई है, उसने अनुभव किया है कि होस्टल के इस नियम का पालन डाँट-फटकार के बावजूद नहीं होता।

‘मैडम, कल से छुट्टियाँ शुरू हो जाएँगी, इसलिए आज रात हम सबने मिलकर... और सुधा पूरी बात न कहकर हेमंती की ओर देखते हुए मुस्कुराने लगी।
‘हेमंती के गाने का प्रोग्राम है; आप भी कुछ देर बैठिए न!’

लतिका को उलझन मालूम हुई। इस समय यहाँ आकर उसने उनके मज़े को किरकिरा कर दिया। इस छोटे-से हिल स्टेशन पर रहते उसे ख़ासा अर्सा हो गया, लेकिन कब समय पतझड़ और गर्मियों का घेरा पार कर सर्दी की छुट्टियों की गोद में सिमट जाता है, उसे कभी याद नहीं रहता।
चोरों की तरह चुपचाप वह देहरी से बाहर हो गई। उसके चेहरे का तनाव ढीला पड़ गया। वह मुस्कुराने लगी।

‘मेरे संग स्नो-फ़ॉल देखने कोई नहीं ठहरेगा?’
‘मैडम, छुट्टियों में क्या आप घर नहीं जा रही है?’ सब लड़कियों की आँखें उस पर जम गईं।

‘अभी कुछ पक्का नहीं है—आई लव द स्नो-फॉल!’
लतिका को लगा कि यही बात उसने पिछले साल भी कही थी और शायद पिछले-से-पिछले साल भी। उसे लगा, मानो लड़कियाँ उसे संदेह की दृष्टि से देख रही हैं, मानो उन्होंने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। उसका सिर चकराने लगा। मानो बादलों का स्याह झुरमुट किसी अनजाने कोने से उठकर उसे अपने में समा लेगा। वह थोड़ा-सा हँसी, फिर धीरे से उसने अपने सिर को झटक दिया।

‘जूली, तुमसे कुछ काम है, अपने ब्लॉक में जाने से पहले मुझसे मिल लेना—वेल, गुड नाइट!’ लतिका ने अपने पीछे दरवाज़ा बंद कर दिया।
‘गुड नाइट मैडम, गुड नाइट, गुड नाइट...!’

गलियारे की सीढ़ियाँ न उतरकर लतिका रेलिंग के सहारे खड़ी हो गई। लैंप की बत्ती को नीचे घुमाकर कोने में रख दिया। बाहर धुँध की नीली तहें बहुत घनी हो चली थीं। लॉन पर लगे हुए चीड़ के पत्तों की सरसराहट हवा के झोंकों के संग कभी तेज़, कभी धीमी होकर भीतर वह आती थी। हवा में सर्दी का आभास पाकर लतिका के दिमाग़ में कल से शुरू होने वाली छुट्टियों का ध्यान भटक आया। उसने आँखें मूँद ली। उसे लगा कि जैसे उसकी टाँगें बाँस की लकड़ियों की तरह उसके शरीर से बँधी हैं जिनकी गाँठें धीरे-धीरे खुलती जा रही हैं। सिर की चकराहट अभी मिटी नहीं थी, मगर अब जैसे वह भीतर न होकर बाहर फैली हुई धुँध का हिस्सा बन गई थी।
सीढ़ियों पर बातचीत का स्वर सुनकर लतिका जैसे सोते से जगी। शॉल को कंधों पर समेटा और लैंप उठा लिया। डॉक्टर मुकर्जी मिस्टर ह्यूबर्ट के संग एक अँग्रेज़ी धुन गुनगुनाते हुए ऊपर आ रहे थे। सीढ़ियों पर अँधेरा था और ह्यूबर्ट को बार-बार अपनी छड़ी से रास्ता टटोलना पड़ता था। लतिका ने दो-चार सीढ़ियाँ उतरकर लैंप को नीचे झुका दिया। ‘गुड इवनिंग डॉक्टर, गुड इवनिंग मिस्टर ह्यूबर्ट!’ ‘थैंक यू मिस लतिका’—ह्यूबर्ट के स्वर में कृतज्ञता का भाव था। सीढ़ियाँ चढ़ने से उनकी साँस तेज़ हो रही थी और वह दीवार से लगे हुए हाँफ रहे थे। लैंप की रौशनी में उनके चेहरे का पीलापन कुछ ताँबे के रंग-जैसा हो गया था।

‘यहाँ अकेली क्या कर रही हो मिस लतिका?’ डॉक्टर ने होंठों के भीतर से सीटी बजाई।
‘चेकिंग करके लौट रही थी। आज इस वक़्त ऊपर कैसे आना हुआ मिस्टर ह्यूबर्ट?’

ह्यूबर्ट ने मुस्कुराकर अपनी छड़ी डॉक्टर के कंधों से छुआ दी—’इनसे पूछो, यही मुझे ज़बरदस्ती घसीट लाए हैं।’
‘मिस लतिका, हम आपको निमंत्रण देने आ रहे थे। आज रात मेरे कमरे में एक छोटा-सा कंसर्ट होगा, जिसमें मि. ह्यूबर्ट शोपाँ और चाइकोव्स्की के कंपोज़ीशन बजाएँगे और फिर क्रीम-कॉफ़ी पी जाएगी। और उसके बाद अगर समय रहा, तो पिछले साल हमने जो गुनाह किए हैं उन्हें हम मिलकर कन्फ़ेस करेंगे।’ डॉक्टर मुकर्जी के चेहरे पर उभरी मुस्कान खेल गई।

‘डॉक्टर, मुझे माफ़ करें, मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।’
‘चलिए, यह ठीक रहा। फिर तो आप वैसे भी मेरे पास आती।’ डॉक्टर ने धीरे से लतिका के कंधों को पकड़कर अपने कमरे की तरफ़ मोड़ दिया।

डॉक्टर मुकर्जी का कमरा ब्लॉक के दूसरे सिरे पर छत से जुड़ा हुआ था। वह आधे बर्मी थे, जिसके चिह्न उनकी थोड़ी दबी हुई नाक और छोटी-छोटी चंचल आँखों से स्पष्ट थे। बर्मा पर जापानियों का आक्रमण होने के बाद वह इस छोटे से पहाड़ी शहर में आ बसे थे। 

प्राइवेट प्रैक्टिस के अलावा वह कान्वेंट स्कूल में हाईजीन-फ़िज़ियालॉजी भी पढ़ाया करते थे और इसलिए उनको स्कूल के होस्टल में ही एक कमरा रहने के लिए दे दिया गया था। कुछ लोगों का कहना था कि बर्मा से आते हुए रास्ते में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई, लेकिन इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि डॉक्टर स्वयं कभी अपनी पत्नी की चर्चा नहीं करते।
बातों के दौरान डॉक्टर अक्सर कहा करते हैं—‘मरने से पहले मैं एक बार बर्मा ज़रूर जाऊँगा’—और तब एक क्षण के लिए उनकी आँखों में एक नमी-सी आ जाती। लतिका चाहने पर भी उनसे कुछ पूछ नहीं पाती। उसे लगता कि डॉक्टर नहीं चाहते कि कोई अतीत के संबंध में उनसे कुछ भी पूछे या सहानुभूति दिखलाए। दूसरे ही क्षण अपनी गंभीरता को दूर ठेलते हुए वह हँस पड़ते—एक सूखी, बुझी हुई हँसी।

होम-सिक्नेस ही एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं है।
छत पर मेज़-कुर्सियाँ डाल दी गई और भीतर कमरे से पर्कोलेटर में कॉफ़ी का पानी चढ़ा दिया गया।

‘सुना है अगले दो-तीन वर्षों में यहाँ पर बिजली का इंतिज़ाम हो जाएगा—’ डॉक्टर ने स्प्रिट-लैंप जलाते हुए कहा।
‘यह बात तो पिछले सालों से सुनने में आ रही है। अँग्रेज़ों ने भी कोई लंबी-चौड़ी स्कीम बनाई थी पता नहीं उसका क्या हुआ’—ह्यूबर्ट ने कहा। वह आराम-कुर्सी पर लेटा हुआ बाहर लॉन की ओर देख रहा था।

लतिका कमरे से दो मोमबत्तियाँ ले आई। मेज़ के दोनों सिरों पर टिकाकर उन्हें जला दिया गया। छत का अँधेरा मोमबत्ती की फीकी रौशनी के इर्द-गिर्द सिमटने लगा। एक घनी नीरवता चारों ओर घिरने लगी। हवा में चीड़ के वृक्षों की साँय-साँय दूर-दूर तक फैली पहाड़ियों और घाटियों में सीटियों की गूँज-सी छोड़ती जा रही थी।
‘इस बार शायद बर्फ़ जल्दी गिरेगी, अभी से हवा में एक सर्द ख़ुश्की-सी महसूस होने लगी है’—डॉक्टर का सिगार अँधेरे में लाल बिंदी-सा चमक रहा था।

पता नहीं, मिस वुड को स्पेशल सर्विस का गोरखधंधा क्यों पसंद आता है। छुट्टियों में घर जाने से पहले क्या यह ज़रूरी है कि लड़कियाँ फ़ादर एल्मंड का सर्मन सुनें?’ ह्यूबर्ट ने कहा।
‘पिछले पाँच साल से मैं सुनता आ रहा हूँ—फ़ादर एल्मंड के सर्मन में कही हेर-फेर नहीं होता।’

डॉक्टर को फ़ादर एल्मंड एक आँख नहीं सुहाते थे।
लतिका कुर्सी पर आगे झुककर प्यालों में कॉफ़ी उँड़ेलने लगी। हर साल स्कूल बंद होने के दिन यही दो प्रोग्राम होते हैं—चैपल में स्पेशल सर्विस और उसके बाद दिन में पिकनिक। लतिका को पहला साल याद आया जब डॉक्टर के संग पिकनिक के बाद वह क्लब गई थी। 

डॉक्टर बार में बैठे थे। बॉल-रूम कुमाऊँ रेजीमेंट अफ़सरों से भरा हुआ था। कुछ देर तक बिलियर्ड का खेल देखने के बाद जब वह वापस बार की ओर आ रहे थे, तब उन्होंने दाई ओर क्लब की लाइब्रेरी में देखा—मगर उसी समय डॉक्टर मुकर्जी पीछे से आ गए थे। ‘मिस लतिका, यह मि.गिरीश नेगी हैं?’ बिलियर्ड-रूम से आते हुए हँसी-ठहाकों के बीच वह कुछ ठहर गया था। वह किसी किताब के बीच में उँगली रखकर लाइब्रेरी की खिड़की से बाहर देख रहा था। ‘हलो डॉक्टर’ वह पीछे मुड़ा। तब उस क्षण...उस क्षण न जाने क्यों लतिका का हाथ काँप गया और कॉफ़ी की गर्म बूँदें उसकी साड़ी पर छलक आई। अँधेरे में किसी ने नहीं देखा कि लतिका के चेहरे पर एक उनींदा रीतापन घिर आया है।

हवा के झोंके से मोमबत्तियों की लौ फड़कने लगी। छत से भी ऊँची काठ-गोदाम जाने वाली सड़क पर यू. पी. रोडवेज़ की आख़िरी बस डाक लेकर जा रही थी। बस की हैड-लाइट्स में आस-पास फैली हुई झाड़ियों की छायाएँ घर की दीवार पर सरकती हुई ग़ायब होने लगी।
‘मिस लतिका, आप इस साल भी छुट्टियों में यहीं रहेंगी?’ डॉक्टर ने पूछा।

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