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॥ नीति शतकम् भर्तृहरिविरचितम् ॥

परिचय:

भर्तृहरि विरचित नीति शतकम् में मनुस्मृति और महाभारत की गम्भीर नैतिकता, कालीदास की-सी प्रतिभा के साथ प्रस्फुटित हुई है। विद्या, वीरता, दया, मैेत्री, उदारता, साहस, कृतज्ञता, परोपकार, परायणता आदि मानव जीवन को ऊंचा उठानेेेे वाली उदात्त भावनाओं का उन्होेेेंनेेे बड़ी सरल एवं सरस पद्यावली में वर्णन किया है। उन्होंने इसमें जिन नीति-सिद्धांतों का वर्णन किया है वे मानव मात्र के लिए अंधरेेे में दीपक के समान हैं।

पाश्चात्य लेखक आर्थर डब्ल्यू राइडर के अनुसार छोटे-छोटे पद्य अथवा श्लोक लिखने में भारतीय सबसे आगे हैं। उनका इस रीति पर अधिकार, कल्पना की उड़ान, अनुभूति की गहराई और कोमलता- सभी अत्युत्कृष्ट हैं। जिन व्यक्तियो ने ऐसे पद्य लिखे हैं उनमें भर्तृहरि अग्रणी हैं।

नीति शतक के श्लोक हिंदी अंग्रेजी अर्थ सहित भर्तृहरि विरचितम्

मंगलाचरणम्

दिक्‍कालाद्यनवच्छिन्‍नानन्‍तचिन्‍मात्रमूर्तये ।
स्‍वानुभूत्‍येकमानाय नम: शान्‍ताय तेजसे ।। 1 ।।

अर्थ:

दशों दिशाओं और तीनो कालों से परिपूर्ण, अनंत और चैतन्य-स्वरुप अपने ही अनुभव से प्रत्यक्ष होने योग्य, शान्त और तेजरूप परब्रह्म को नमस्कार है ।

My salutation to the peaceful light, whose form is only pure intelligence unlimited and unconditioned by space, time, and the principal means of knowing which is self-perception.

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता,
साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या,
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ।। 2 ।।

अर्थ:
मैं जिसके प्रेम में रात दिन डूबा रहता हूँ – किसी क्षण भी जिसे नहीं भूलता, वह मुझे नहीं चाहती, किन्तु किसी और ही पुरुष को चाहती है । वह पुरुष किसी और ही स्त्री को चाहता है । इसी तरह वह स्त्री मुझे प्यार करती है । इसलिए उस स्त्री को, मेरी प्यारी के यार को, प्यारी को, मुझको और कामदेव को, जिसकी प्रेरणा से ऐसे ऐसे काम होते हैं, अनेक धिक्कार है ।

The woman whom I adore has no affection for me; she, however, adores another who is attached to some one else; while a certain woman is in love with me even when I do not reciprocate the feelings. Fie on her, on him, on the God of Love, on that woman, and on myself.

मूर्खपद्धतिः

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्य्ते विशेषज्ञ: ।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति ।। 3 ।।

अर्थ:
हिताहितज्ञानशून्य नासमझ को समझाना बहुत आसान है, उचित और अनुचित को जानने वाले ज्ञानवान को राजी करना और भी आसान है; किन्तु थोड़े से ज्ञान से अपने को पण्डित समझने वाले को स्वयं विधाता भी सन्तुष्ट नहीं कर सकता ।

An ignorant man can be easily convinced, a wise man can still more easily be convinced: but even Lord Brahma cannot please him who is puffed up with a little knowledge because half knowledge makes a man very proud and blind to logic.

प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरदंष्ट्रान्तरात्
समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदुर्मिमालाकुलाम् ।
भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ।। 4 ।।

अर्थ:
यदि मनुष्य चाहे तो मकर की दाढ़ों की नोक में से मणि निकल लेने का उद्योग भले ही करे; यदि चाहे तो चञ्चल लहरों से उथल-पुथल समुद्र को अपनी भुजाओं से तैर कर पार कर जाने की चेष्टा भले ही करे, क्रोध से भरे हुए सर्प को पुष्पहार की तरह सर पर धारण करने का साहस करे तो भले ही करे, परन्तु हठ पर चढ़े हुए मूर्ख मनुष्य के चित्त की असत मार्ग से सात मार्ग पर लाने की हिम्मत कभी न करे ।

With courage, we could extract the pearl stuck in between crooked teeth of a crocodile. We could sail across an ocean that is tormented by huge waves. We may even be able to wear an angry snake on our head as if it were a flower. However it is impossible to satisfy an obstinate fool.

 

लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नत: पीडयन्
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दित:।
कदाचिदपि पर्यटन् शशविषाणमासादयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ।। 5 ।।

अर्थ:
कदाचित कोई किसी तरकीब से बालू में से भी तेल निकल ले, कदाचित कोई प्यासा मृगतृष्णा के जल से भी अपनी प्यास शान्त कर ले; कदाचित कोई पृथ्वी पर घुमते घुमते घरगोश का सींग भी खोज ले; परन्तु हठ पर चढ़े हुए मूर्ख मनुष्य के चित्त को कोई भी अपने काबू में नहीं कर सकता ।

If enough effort is put in, we can extract oil by squeezing sand. You may be able to drink water at a mirage. It is also possible to even spot a rabbit with horns while roaming around the world. However it is impossible to get a prejudiced fool to see logic.

व्यालं बाल-मृणाल-तन्तुभिरसौरोद्धं समुज्जृम्भते,
भेत्तुं वज्रमपि शिरीषकुसुम-प्रान्तेन सन्नह्यते ।
माधुर्यं मधुबिन्दुना रचयितुं क्षाराम्बुधेरीहते,
ने तुं वांछति यः खलान्पथि सतां सूक्तैः सुधास्यन्दिभिः ।। 6 ।।

अर्थ:
जो मनुष्य अपने अमृतमय उपदेशों से दुष्ट को सुराह पर लाने की इच्छा करता है, वह उसके सामान अनुचित काम करता है, जो कोमल कमल की डण्डी के सूत से ही मतवाले हाथी को बांधना चाहता है, सिरस के नाजुक फूल की पंखुड़ी से हीरे को छेदना चाहता है अथवा एक बूँद मधु से खारे महासागर को मीठा करना चाहता है ।

He who wishes to lead the wicked fool into the path of the virtuous by sweet persuasive language is like one who endeavors to curb a maddened elephant by means of tender lotus filaments, like one who tries to cut the diamond with the edge of the Shirisha flower, or like one who hopes to sweeten the salt waters of the ocean by means of a drop of honey.

स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः ।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम् ।। 7 ।।

अर्थ:
मूर्खों को अपनी मूर्खता छिपाने के लिए ब्रह्मा ने “मौन धारण करना” अच्छा उपाय बता दिया है और वह उनके अधीन भी कर दिया है । मौन मूर्खता का ढक्कन है । इतना ही नहीं वह विद्वानों की मण्डली में उनका आभूषण भी है ।

The creator has produced for ignorance, a cover which is within one’s own control and which is certain in its efficacy. In the assembly of the well-versed, silence specially becomes the ornament of the ignorant.

 

यदा किञ्चिज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवं
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः ।
यदा किञ्चित् किञ्चित् बुधजनसकाशादवगतं

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