दक्षिणी भारत में एक छोटे से पहाड़ी खेड़े में बुलबुली नाम की एक छोटी सी लड़की रहती थी। वह अपनी माँ के साथ ऊँचे, हरे
पेड़ों से घिरी एक झोंपड़ी में रहती थी। इतने ऊँचे और हरे-भरे पेड़ किसी ने कभी न देखे होंगे। कोहरे वाले दिन पौधों और पेड़ों
की पत्तियों से ओस की नन्ही-नन्ही बूदें टपकतीं तो लगता परीलोक में बारिश हो रही है।
बुलबुली अपने नाम की तरह ही हँसमुख थी। वह अपने साथियों के साथ गाँव के आस-पास के जंगल के ओरछोर तक कूदती
फिरती। सुबह तरह-तरह की सुगन्धों से भरी हवा में गहरी साँसें लेना उसको बहुत अच्छा लगता था। कभी हवा में मीठी-मीठी
भीनी-भीनी खुशबू होती थी, कभी तेज़ ओर तीखी गंध।
रोज सुबह तोताराम बुलबुली की झोंपड़ी के सामने के ऊँचे पेड़ पर बैठकर उसे जंगल के हालचाल बताता। वह उसको देश-विदेश के लोगों की बातें बताता। बुलबुली को तोताराम की कहानियाँ अच्छी लगती थीं।
तोताराम की बातें सुन कर उसका दिल बल्लियों उछलता और उसका मन होता कि मैं भी दूर देश जाऊँ वहाँ के नदियाँ-पहाड़-जंगल देखूँ। लेकिन फिर वह ठंडी साँस लेकर रह जाती- उसने तो बावली घाटी भी नहीं देखी थी।
गाँव के लोग अक्सर बावली घाटी की बातें करते। वहाँ गया कोई नहीं था, सबने उसके बारे में सुना ही सुना था। लोगों की बातों से लगता था कि बावली घाटी कोई कमाल की जगह है।
बुलबुली सोचती कि अगर मैं कभी बावली घाटी गई तो लौट कर सबको वहाँ के बारे में बताऊँगी, फिर वह लोगों के लिए अनजानी जगह नहीं रह जायेगी।
एक दिन नींद से जागते ही बुलबुली को तोताराम की याद आई। मुर्गियों को दाना डालते, उनके अण्डे जमा करते, गायों को चारा देते, उन्हें दुहते, वह तोताराम की सीटी का ही इन्तज़ार करती रही। आखिर पाठशाला का समय हो गया और वह पाठशाला चली गई।
उसकी पाठशाला बरगद के एक घने पेड़ की नीचे लगती थी। जब कभी बारिश होती तो पाठशाला में छुट्टी हो जाती।
उस दिन बुलबुली का मन पढ़ने में नहीं लग रहा था। उसकी आँखें तोताराम को ढूँढ रही थीं जो रोज़ ही उससे मिलने आता था। आज तोताराम कहाँ है? फिर कई दिन बीत गए तोताराम नहीं आया, बुलबुली परेशान होने लगी।
पाठशाला की छुट्टी के बाद बुलबुली तोताराम को पुकारती जंगल में घूमती, "IIतुम कहाँ हो तोताराम? बोलो न ... " लेकिन कोई जवाब न आता।
फिर एक सुबह सूरज उगने से भी पहले, भोर के समय उसको किसी पंछी की परेशान आवाज़ सुनाई दी। "जागो बुलबुली! जागो!" वह कूद कर बाहर दौड़ी। तोताराम ही था।
"तुम कहाँ थे तोताराम? मैं तो बहुत डर रही थी, क्या हुआ? तुम इतने परेशान क्यों हो?"
"बावली घाटी में आफ़त आ गई है। जंगल में लड़ाई छिड़ी है। "धीरे-धीरे बोलो तोताराम नहीं तो सारा गाँव जाग जाएगा। किस आफ़त की बात कर रहे हो? कौन लड़ रहा है?" बुलबुली ने पूछा। "जंगल .........
अरे, माफ़ करना बुलबुली, मैं फिर जोर से बोल गया। जंगल लड़ रहे हैं। बावली घाटी बदल गई है, सभी जानवर डरे हुए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि अब क्या होगा। बुलबुली कोई उपाय सोचो," तोताराम घबरा कर बोला।
"मैं समझ नहीं पा रही, जंगल कैसे लड़ सकते हैं? तुम मुझे बावली घाटी क्यों नहीं ले चलते," बुलबुली बोली।
तोताराम और भी परेशान हो गया, "Iबावली घाटी पहुँचने के लिए दो दिन चलना पड़ता है, दो रातें राह में ही सोना पड़ता है।
छोटे-छोटे पैरों से तुम इतनी दूर तक नहीं चल पाओगी,"मेरे पैर छोटे हैं तो क्या हुआ मेरा दिमाग तो छोटा नहीं है? मैं मुश्किल काम से नहीं डरती, और फिर कोशिश तो मैं कर ही सकती हूँ।" बुलबुली बोली। सफ़र लम्बा और कठिन है
बुलबुली, मुझे नहीं लगता कि ... " बुलबुली ने तोताराम की बात बीच में ही काट दी, "मैं जा कर देखूँगी नहीं तो उपाय कैसे बताऊँगी? तुम तो बस मुझे बावली घाटी ले चलो।" काफ़ी सोचविचार के बाद तोताराम तैयार हो गया,
"अच्छा चलो, लेकिन अभी चलना होगा।"
बुलबुली बोली कि माँ को बता दूँ कि मैं तोताराम के साथ बावली घाटी जा रही हूँ। लेकिन तोताराम ने कहा, "रास्ते में मेरी दोस्त कोयल मिलेगी। सुबह वही तुम्हारी माँ को बता देगी, देर मत करो, झटपट चलो।"
यूँ वे बावली घाटी की ओर चल दिये। तोताराम बुलबुली के आगे-आगे राह दिखाता उड़ रहा था। बुलबुली को तो घनी झाड़ियों और ऊँची घास में घूमने की आदत थी ही, वह उछलती कूदती चलती रही। कई घंटे चलने के बाद वह थक गई, उसे भूख भी लगने लगी।
तोताराम बोला, "बस थोड़ी दूर के बाद नारियल के पेड़ आएँगे बुलबुली। तब तुम अपनी भूख-प्यास मिटा लेना।"
नारियल के पेड़ों के झुरमुट के पास पहुँचकर तोताराम ने ज़ोर से सीटी बजाई ई ... ई ... ई पलक झपकते ही उस का दोस्त बंदरू कूदता-फाँदता आ पहुँचा, " कहाँ
चले तोताराम?"
" बताता हूँ बंदरू पहले कुछ खिलाओ तो सही। मेरी दोस्त बुलबुली को भूख लगी है," तोताराम बोला।
बंदरू कूद कर पेड़ पर चढ़ा और तीन कच्चे नारियल नीचे फेंके। चट्टान पर गिर कर नारियल फूट गए।
बुलबुली ने झटपट नारियल उठाए और उनकी मलाईदार गिरी खाने लगी।
खा पीकर बुलबुली बोली,
"शुक्रिया बंदरू। नारियल बहुत बढ़िया थे। "लौटते हुए फिर मिलना। तब तुम लोगों की बढ़िया खातिर करूँगा निशाना बड़ा अच्छा है मेरा! बंदरू फुदक कर बोला।
तोताराम और बुलबुली आगे चल दिये। कई घंटे चलने के बाद बुलबुली बहुत थक गई। लेकिन उसे लग रहा था कि जल्दी से जल्दी बावली घाटी पहुँच जाऊँ। बावली घाटी बहुत कम लोगों ने देखी थी और खुद उस के गाँव के लोगों ने तो उसके बारे में सिर्फ सुना ही था।
पैर थके थे लेकिन बावली घाटी देखने का शौक बुलबुली को खींचे लिए जा रहा था।
धीरे-धीरे शाम ढलने लगी। बुलबुली खुश हो गई, बस कल दिनभर और चलना होगा फिर हम बावली घाटी पहुँच जाएँगेI बुलबुली एक घने पेड़ के नीचे सो गई, तोताराम पेड़ की डाल पर बैठ गया।
सुबह हज़ारों चिड़ियों की चहचहाहट से बुलबुली की आँख खुली। बुलबुली ने अंगड़ाई ली। यहाँ भी हवा में वही जानी पहचानी खुशबुएँ थीं जो उसके गाँव की हवा में थीं लेकिन हवा में एक नई ताज़गी थी।
"तोताराम! यहाँ हवा में कितनी ताज़गी है न?" बुलबुली खुशी से चहकी। "अरे आगे की हवा में और भी ताज़गी है। फटाफट कदम बढ़ाओ," तोताराम बोला। आज बुलबुली ज्यादा बातें नहीं कर रही थी। तोताराम समझ गया कि उसके पैर थक गए हैं और उसे भूख भी लग रही होगी।
वह बुलबुली के कंधे पर बैठकर बोला, "बस नदी पास ही है। वहीं थोड़ा आराम करेंगे।" कुछ दूर चलने पर बुलबुली को पानी की कलकल सुनाई देने लगी। और आगे बढ़े तो धूप में काँच की तरह चमकती नदी दिखी।
बुलबुली थकान भूल कर दौड़ पड़ी, उसने ओक में भर भरकर जी भर पानी पिया फिर छपछप करते खूब मुँह हाथ धोए। बुलबुली आँखें मूँदे घास पर लेटी थी कि तोताराम ने उस की हथेली पर सुंदर, लाल फलों का गुच्छा रख दिया।
"हाय कितने सुंदर फल हैं! तोताराम तुम भी खाओ न," बुलबुली ने एक फल मुँह में डाला। ऐसा रसीला फल उसने कभी नहीं खाया था। हैरानी से उसकी आँखें फैल गई। तोताराम मुस्कराया, "हैं न स्वादिष्ट? मेरी चिन्ता मत करो, मैं भरपेट खाकर आया हूँ।"
थोड़ी देर आराम करके बुलबुली और तोताराम आगे चल दिए। बुलबुली चलती जा रही थी और तोताराम बतियाता हुआ ठीक उसके सिर के ऊपर उड़ रहा था। कई घंटे चलने के बाद बुलबुली बैठ गयी और बोली, "तोताराम, अब मैं आराम करना चाहती हूँ। मैं वाकई थक गयी हूँ।"
तोताराम ने एक ज़ोरदार सीटी बजाई। मिनटों में एक हाथी वहाँ आ पहुँचा। तोताराम ने हाथी की जान-पहचान बुलबुली से करवाई और उसे बावली घाटी की अपनी यात्रा के बारे में बताया। "मुझे लगता है कि जंगल की उलझन कोई इंसान ही सुलझा सकता है।
जंगल हमारे लिए स्वर्ग जैसा था, अब जानवर वहाँ से भाग रहे हैं," हाथी ने चिन्तित होकर कहा। तोताराम ने हाथी से पूछा "तुम बुलबुली को अपनी पीठ पर बैठाओगे? वह बहुत थक चुकी है।'
"ज़रूर! तुम मेरी पीठ पर चढ़कर बैठ जाओ, लेकिन मैं तुम्हें पगडन्डी तक ही पहुँचा पाऊँगा। मैं अपने झुण्ड से ज़्यादा देर तक अलग नहीं रह सकता,"हाथी बोला।
बुलबुली ने राहत की साँस ली। हाथी की पीठ पर बैठकर उसके नन्हे पैरों को आराम तो मिला ही वह जंगल का शानदार नज़ारा भी देख पा रही थी। तोताराम की ही तरह हाथी ने भी उसे कई कहानियाँ सुनाई।
दिन अच्छा गुज़रा।
शाम ढलने पर तीनों एक गुफ़ा में रुके। तोताराम और हाथी ने सूखी पत्तियाँ और घासफूस इकट्ठा कर बुलबुली के लिए बिस्तर तैयार किया। लेटते ही बुलबुली गहरी नींद में सो गयी।
तीसरे दिन सुबह तोताराम को बुलबुली को जगाना नहीं पड़ा। भोर होते ही वह जाग गयी। उसने खुशी-खुशी तोताराम के दिए जामुन खाए। बुलबुली, तोताराम और
हाथी अपने सफ़र पर बढ़े। बुलबुली समझ नहीं पा रही थी कि आगे क्या होगा, बावली घाटी कैसी होगी? फिर जंगलों की लड़ाई की भी चिंता थी। जैसे-जैसे वह बावली घाटी के पास पहुँच रही थी उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा था।