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Unfolding stories, please wait...

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रंज के गाँव में जो पानी का तालाब था वो लगभग सूख चुका था। अज्जी बारिश के लिए प्रार्थना करने लगी। अम्मा ने घर में पड़े सभी बर्तन और
बाल्टियों को इकठ्ठा कर उनमें पानी भर दिया।

"हमें ज़्यादा से ज़्यादा पानी इकठ्ठा करके रखना पड़ेगा," उन्होनें कहा।

अप्पा ने थोड़ा गहरा खोदने के लिए औज़ार इकठ्ठा किये। "जब तक बारिश नहीं होती, तब तक गुज़ारे लायक पानी हमें चाहिए होगा," उन्होनें
कहा।

 

 

 

 

रंज ने अपनी कॉपी और पेंसिल निकाली। फिर अपने दिमाग में पानी के बारे में सोचते हुए चल पड़ी अपने अम्मा-अप्पा के पीछे, पानी के तालाब की ओर। उसने तालाब की निचली सतह की बहुत बारीकी से जांच की। 

तालाब का तला सूखा और दरारों से भरा था। रंज सोच में पड़ गयी, "तालाब का सारा पानी कहाँ चला गया? क्या वो भाग गया?
क्या उसे किसी ने चुरा लिया? ये एक बड़ा रहस्य है।"

रंज को रहस्य सुलझाना बेहद पसंद था। जैसे जब अज्जी को अपने पढ़ने वाले चश्मे नहीं मिल रहे थे।

तब रंज ने उनको ढूंढ निकाला था। चश्मे अज्जी की किताब में मिले, उसी पेज पर जो वो पढ़ रही थी।

फिर दूसरी दफा - हाथी भला रागी के खेतों में क्यों आ जाते हैं? तो पता चला कि उनकी जो लंबी - लंबी सूंड़ होती हैं उनसे वो पके हुए अनाज को दूर से ही सूंघ लेते
हैं। और उन्हें खाने आ जाते हैं।

"मैं उस पानी को ढूँढ निकालूंगी," रंज ने बुदबुदाते हुए कहा।

रंज सूखी हुई काई और मरी हुई मछलियों को पार करके तालाब के दूसरी ओर पहुँची।

"क्या आपको पता है कि पानी कहाँ जा सकता है?" उसने एक मछुआरे से पूछा।

"लगता है नीचे की ओर बह गया," मछुआरे ने अंदाजा लगाया।

रंज ने पहाड़ी से नीचे जाती हुई उस सूखी नदी का पीछा किया। जहाँ पर वो नहर ख़त्म हुई वहाँ एक
और तालाब था। वहाँ ढेरों बकरियाँ थीं पर पानी नहीं था।

रंज ने बकरी चराने वाले से पूछा," क्या आप जानते हैं कि पानी कहाँ हो सकता है?"

"शायद, ऊपर!" उस ने कहा।

"मैं तो वहीं से आई हूँ," रंज बोली। "पानी वहाँ नहीं है।"

"तो और ऊपर होगा?" बकरी चराने वाला बोला। "वहीं से तो पानी आता है।"

रंज तालाब तक वापिस चढ़ी। फिर वो पहाड़ी के थोड़ा और ऊपर चढ़ी जहाँ एक और तालाब था। वहाँ न तो पानी था, न पक्षी और ना ही नाव।
केवल एक ही व्यक्ति था वहाँ।

"सपना, मुझे पानी कहीं भी नहीं मिल रहा। क्या तुम्हें अंदाजा है, कि पानी कहाँ चला गया?" रंज ने ज़ोर से आवाज़ लगाई। वो सपना को जानती
थी। वो उसके स्कूल में ही पढ़ती थी।

"नीचे", सपना ने चिल्लाते हुए जवाब दिया।

रंज को एकदम गुस्सा आ गया। उसने अपना पाँव ज़ोर से पटका।

"नहीं!" वो चिल्लाई। "नहीं है। न वो नीचे है और ना ही ऊपर। मैं ढूँढ-ढूँढ के परेशान हो गयी हूँ।
समझ आया?"

"तो क्या, ऊपर, वहाँ?, सपना ने अंदाज़ा लगाया।

रंज और सपना दोनों ने ऊपर आसमान की तरफ देखा। सूरज ने वापस उनकी तरफ घूरा। आसमान
उजला था, गर्मी और धूल से भरा।

"नहीं", दोनों ने हामी में सर हिलाया। वहाँ तो बिलकुल भी नहीं हो सकता।

रंज हताश होकर सपना के संग नाव में जाकर बैठ गयी और कमलककड़ी का एक टुकड़ा चबाने लगी।

वो गर्मी और थकान के मारे बेहाल थी। "मंजू के माता-पिता गाँव छोड़कर चले गए," रंज ने कहा। "वो शहर चले गए जहाँ पर पानी है। शायद हम
सभी को यहाँ से चले जाना चाहिए।"

"तुम जाओ," सपना ने चिढ़ते हुए कहा। "तुम्हें किसी ने नहीं कहा यहाँ रहने के लिए।"

"हाँ! हाँ! ठीक है", रंज ने गुस्से में कहा और पाँव पटकती हुई घर चली गयी।
पर कुछ भी ठीक नहीं था। पानी अभी भी नहीं था। और न ही बारिश।

अगले दिन रंज ने छोटे से गिलास में तालाब के गदले पानी से दाँत मांजे।

"आकथू!" रंज ने थूका।

स्कूल में कक्षा आधी खाली थी। बहुत से परिवार उस इलाके को छोड़ चुके थे।

रंज से अब और बर्दाश्त नहीं हुआ। उसे अपने सभी दोस्तों की याद आ रही थी!

पर्यावरण अध्ययन की क्लास चल रही थी। क्लास के बीच में वो उठी और स्कूल के बाहर भाग गयी।

वो भागती रही, भागती रही, भागती रही। वो बुरी तरह हाँफ रही थी। आखिरकार वो सड़क के किनारे जाकर बैठ गयी।

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