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'क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं देखने जाएगी क्‍या ?

बिरजू की माँ शकरकंद उबालकर बैठी मन-ही-मन कुढ़ रही थी अपने आँगन में । सात साल का लड़का बिरजू शकरकंद के बदले तमाचे खाकर आँगन में लोटलोटकर सारी देह में मिट्टी मल रहा था | चम्पिया के सिर भी चुड़ल मँडरा रही है -““आध-आँगन धूप रहते जो गयी है सहुआइन की दूकान छोवा-गुड़ जाने, सो अभी तक नही लौटी, दीया-बाती की बेला हो गयी । आए आज लौट के ज़रा ! बागड़ बकरे की देह में कुकुरमाछी लगी थी, इसलिए बेचारा बागड़ रह-रहकर कद-फाँद कर रहा था । बिरजू की माँ बागड पर मन का गुस्सा उतारने का बहाना दूँढ़कर निकाल चुकी थी ।'' पिछवाड़े की मिर्च की फूली गाछ * बागड़ के सिवा और किसने कलेवा किया होगा ! बागड को मारने के लिए वह मिट्टी का एक छोटा ढेला उठा चुकी थी कि पड़ासिन मखनी फुआ की पुकार सुनायी पड़ी, क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नही जाएगी क्‍या ?'

“बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पग हिया न हो तब न, फुआ !

गरम गुस्से में बुझी नुकीली बात फुआ की देह में धेंस गयी और बिरजू को माँ ने हाथ के ढेले को पास ही फेंक दिया ' 'बेचारे बागड़ को कुकुरमाछी परीशान कर रही है ! आ-हा, आय '' "आय ! हर॑-र-र-र ! आय-आय !

बिरजू ने लेटे-ही-लेटे बागड को एक डण्डा लगा दिया । बिरजू की माँ की इच्छा हुई कि जाकर उसी डण्डे से बिरजू का भूत भगा दे, किन्तु नीम के पास खड़ी पनभरनियों की खिलखिलाहट सुनकर रुक गयी । बोली, “ठहर, तेरे बप्पा ने बड़ा हथछुट्ठा बना दिया है तुझे ! बड़ा हाथ चलता है लोगों पर | ठहर !

मखनी फुआ नीम के पास झुकी कमर से घड़ा उतारकर पानी भरकर लौटती पनभरनियों से बिरजू की माँ की बहकी हुई बात का इन्साफ़ कर रही थी, जरा देखो तो इस बिरजू की माँ को ! चार मन पाट (जूट) का पैसा क्या हुआ है, धरती पर पाँव ही नहीं पड़ते ' निसाफ करो ! खुद अपने मुँह से आठ दिन पहले से ही गाँव की अली-गली में बोलती फिरी है, हाँ, इस बार बिरजू के बप्पा ने कहा है,

बेलगाड़ी पर बैठाकर बलरामपुर का नाच दिखा लाऊँगा । बैल अब अपने घर है, तो हज़ार गाड़ी मँगनी मिल जाएगी। सो मैंने अभी टोक दिया, नाच देखनेवाली सब तो औन-पौन कर तैयार हो रही हैं, रसोई-पानी कर रही हैं। मेरे मुँह में आग लगे, क्‍यों मैं टोकने गयी ! सुनती हो क्या जवाब दिया बिरज्‌ की माँ ने !”

मखनी फुआ ने अपने पोपले मुँह के ओठों को एक ओर मोड़कर एऐंठती हुई बोली निकाली, अर-रं-हाँ-हाँ | बि-र-र-ज्जू की मै“''या के आगे नाथ और-रंपीछे पगहिया ना हो, तब्ब ना-आ-आ [| ह

जंगी की पुतोह बिरजू की माँ से नहीं डरती । वह ज़रा गला खोलकर ही कहती है, 'फुआ-आ ! सरबे सित्तलमिटी (सर्वे सेटलमेंट) के हाकिम के बासा पर फूलछाप किनारी वाली साड़ी पहनके यदि तू भी भंटा की भेंटी चढ़ाती तो तुम्हारे नाम से भी दु-तीन बीघा घनहर जमीन का पर्चा कट जाता ! फिर तुम्हारे घर भी आज दस मन सोनाबंग पाट होता, जोड़ा बेल खरीदती ! फिर आगे नाथ और पीछे सैकड़ों पगहिया झूलती !!

जंगी की पुतोह म्‌ंहजोर है। रेलवे स्टेशन के पास की लड़की है। तीन ही महीने हुए गोने की नयी बहू होकर आयी है और सारी कुर्मा टोली की सभी झगड़ालू सासों से एकाध मोरचा ले चुकी है। उसका ससुर जंगी दागी चोर है, सीडकिलासी है। उसका खसम रंगी कुर्मा टोली का नामी लठत । इसीलिए हमेशा सीग घ॒ुमाती फिरती है जंगी की पुतोह !

बिरजू की माँ के आँगन में जंगी की पुतोह की गला-खोल बोली गुलेल की गोलियों की तरह दनदनाती हुई आयी । बिरज्‌ की माँ ने एक तीखा जवाब खोजकर निकाला, लेकिन मन मसोसकर रह गयी ।**'गोबर की ढेंरी में कौन ढेला फेके !

जीभ के झाल को गले में उतारकर बिरजू की माँ ने अपनी बेटी चम्पिया को आवाज़ दी, 'अरी चम्पिया-या-या, आज लौटे तो तेरी मूड़ी मरोड़कर चूल्हे में झोंकती हूँ ! दिन-दिन बेचाल होती जाती है !*''गाँव में तो अब ठेठर-बैसकोप का गीत गानेवाली पसुरिया पुतोह सब आने लगी हैं। कही बैठके 'बाजे न मुरलिया' सीख रही होगी ह-र-जा-ई-ई ! अरी चम्पि-या-या-या !

जंगी की पुतोह ने बिरजू की माँ की बोली का स्वाद लेकर कमर पर घड़े को संभाला ओर मटककर बोली, “चल दिदिया चल ! इस मुहल्ले में लालपान की बेगम बसती है ! नही जानती, दोपहर-दिन और चौपहर-रात बिजली की बत्ती भक-भक्‌ कर जलती है !'

भक-भक बिजली-बत्ती की बात सुनकर न जाने क्‍यों सभी खिलखिलाकर हँस पड़ी । फुआ की टूटी हुई दंत-पंक्तियों के बीच से एक मीठी गाली निकली, 'शैतान की नानी !

बिरजू की माँ की आँखों पर मानो किसी ने तेज़ टार्च की रोशनी डालकर चौंधिया दिया।*' 'भक्‌-भक्‌ बिजली-बत्ती ! तीन साल पहले सर्वे कैम्प के बाद गाँव की जलन-ढाही औरतों ने एक कहानी गढ़के फैलायी थी, चम्पिया की माँ के आँगन मे रात-भर बिजली-बत्ती भुकभुकाती थी ! चम्पिया की माँ के आँगन में, नालवाले जूते की छाप घोड़े की टाप की तरह !**'जलो, जलो ! और जलो ! चम्पिया को माँ के आँगन में चाँदी जैसे पाट सूखते देखकर जलने वाली सब औरतें खलिहान पर सोनोली धान के बोझों को देखकर बैगन का भुर्ता हो जाएँगी ।

मिट्टी के बरतन से टपकते हुए छोवा-गुड़ को उँगनियों से चाटती हुई चम्पिया आयी ओर माँ के तमाचे खाकर चीख पड़ी, “मुझे क्‍यों मारती है ए-ए-ए ? सहुआइन जल्दी से सौदा नहीं देती है-ए-ए-ए-एं !”

'सहुआइन जल्दी सोदा नही देती की नानी ! एक सहुआइन की ही दृकान पर मोती झरते हैं।जों जड़ गाइड़कर बैठी हुई थी । बोल, गले पर लात देकर कल्ला तोड़ दूँगी हरजाई, जो फिर कभी '“बाजे न मुरलिया' गाते सुना | चाल सीखने जाती है टीशन की छोकरियों से !'

बिरजू की माँ ने चुप होकर अपनी आवाज़ अन्दाज़ी कि उसकी बात जंगी के झोंपडे तक साफ़-साफ़ पहुँच गयी होगी ।

बिरजू बीती हुई बातो को भूलकर उठ खड़ा हुआ था और धूल झाडइ़ते हुए बरतन से टपकते गुड़ को ललचायी निगाह से देखने लगा था ।'' 'दीदी के साथ वह भी दूकान जाता तो दीदी उसे भी ग्रड़ चटाती, ज़रूर ! वह शकरकंद के लोभ में रहा और माँगने पर माँ ने शकरकंद के बदले'*'

'ए मैया, एक अँगुली गड़ दे-दे ! बिरजू ने तलहथी फंलायी, 'दे ना मैया, एक रत्ती-भर !

'एक रत्ती क्यों, उठाके बरतन को फेक आती हूँ पिछवाड़े में, जाके चाटना ! नही बनेगी मीठी रोटी !*“'मीठी रोर्ट, खाने का मुँह होता है !' विरजू की माँ ने उबले शकरकंद का सूप रोती हुई चम्पिया के सामने रखते हुए कहा, बेठके छिलके उतार, नही तो अभी'* *।'

दस साल की चम्पिया जानती है, शकरकंद छीलते समय कम-से-कम बारह बार माँ उसे बाल पकड़कर झकझोरेगी, छोटी-छोटी खोट निकालकर गालियाँ देगी ।' ' पाँव फैलाके क्‍यों बैठी है उस तरह, बेलज्जी ! चम्पिया माँ के गुस्से को जानती है।

बिरज्‌ ने इस मौके पर थोड़ी-सी खुशामद करके देखा, 'मंया, मैं भी बंठकर शकरकंद छीलू ?'

नही ! माँ ने झिड़ीी दी, एक शकरकंद छीलेगा और तीन पेट में ! जाके सिद्धू की बहू से कहो, एक घण्टे के लिए कड़ाही माँगकर ले गयी तो फिर लौटाने

 

का नाम ही नही । जा जल्दी !'

मुँह लटकाकर आँगन से निकलते-निकलते बिरजू ने शकरकंद और गुड़ पर निगाह दौड़ायी । चम्पिया ने अपने झबरे केश की ओट से माँ की ओर देखा और नज़र बचाकर चुपके से बिरजू की ओर एक शकरकंद फेंक दिया ।*''बिरजू भागा ।

'सूरज भगवान ड्ब गये । दीयाबत्ती की बेला हो गयी । अभी तक गाड़ी" **

चम्पिया बीच में ही बोल उठी, 'कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी नहीं दी मंया ! बप्पा बोले, 'माँ से कहना सब ठीक-ठाक करके तैयार रहे | मलदहिया टोली के मियॉजान की गाड़ी लाने जा रहा हूँ ।'

सुनते ही बिरजू की माँ का चेहरा उतर गया । लगा, छाते की कमानी उतर गयी घोड़ से अचानक । कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी मँगनी नही दी ! तब मिल चुकी गाड़ी ! जब अपने गाँव के लोगों की आँख में पानी नही तो मलदहिया टोली के मियॉजान्‌ की गाड़ी का क्‍या भरोसा ! न तीन में, न तेरह में ! क्या होगा शक रकंद छीलकर ! रख दे उठा के !*' “यह मर्द नाच दिखाएगा | बैलगाड़ी पर चढ़कर नाच दिखाने ले जाएगा ! चढ़ चुकी बेलगाड़ी पर, देख चुकी जी-भर नाच !**' पैदल जानेवाली सब पहुँचकर पुरानी हो चुकी होंगी । के

बिरजू छोटी कड़ाही सिर पर ऑधाकर वापस आया, 'देख दिदिया, मलेटरी टोपी | इस पर दस लाठी मारने से भी कुछ नही होगा ।'

चम्पिया चुपचाप बंठी रही, कुछ बोली नही, ज़रा-सी मुस्क्ररायी भी नही । बिरजू ने समय लिया मेंया का गुस्सा अभी उतरा नही है पूरे तौर से ।

मढेया के अन्दर से बागड़ को बाहर भागती हुई बिरजू की माँ वड़बड़ायी, 'कल की पंचकोड़ी कसाई के हवाले करती हूँ राकस तुझे ! हर चीज़ में मुह लगाएगा । चम्पिया, बाँध दे बगड़ा को। खोल दे गले की घण्टी। हमेशा टुनुरटुनुर ! मुझे जरा नही सुहाता है !'

टुनुर-टुनुर सुनते ही बिरजू को सड़क से जाती हुई बैलगाड़ियों की याद हो आयी । अभी बबुआन टोले की गाड़ियाँ नाच देखने जा रही थी --झनुर-झुनुर बैलों की झुनकी, तुमने सु"

'बेसी बक-बक मत करो !' बागड़ के गले से झुनकी खोलती बोली चम्पिया।

'चम्पिया, डाल दे चूल्हे में पानी ! बप्पा आवें तो कहना कि अपने उड़नजहाज़ पर चढ़कर नाच देख आएं ! मुझे नाच देखने का सौख नही ! ' “मुझे जगाइयो मत कोई ! मेरा माथा दुख रहा है।'

मढ़ैया के ओसारे पर बिरजू ने फिसफिसा के पूछा, 'क्योंकर दिदिया, नाच मे उड़नजहाज भी उड़ेगा ?*

चटाई पर कथरी ओढ़कर बँठती हुई चम्पिया ने बिरज्‌ को चुपचाप अपने पास

बैठने का इशारा किया, मुफ्त में मार खाएगा बेचारा !

बिरजू्‌ ने बहन की कथरोी में हिस्सा बाँटते हुए चक्‍की-मुक्की लगायी । जाड़े के समय इस तरह घुटने पर ठुड्डी रखकर चुक्की-मुक्की लगाना सीख चुका है वह । उसने चम्पिया के कान के पास मुँह ले जाकर कहा, 'हम लोग नाच देखने नही जाएँगे ?'* “गाँव मे एक पंछी भी नही है। सब चले गये ।'

चम्पिया को अब तिल-भर भी भरोसा नही। संझा तारा डूब रहा है। बप्पा अभी तक गाड़ी लेकर नहीं लौटे ।"* "एक महीना पहले से ही मैया कहती थी, बलरामपुर के नाच के दिन मीठी रोटी बनेगी; चम्पिया छीट की साड़ी पहनेगी; बिरजू पेट पहनेगा। बेलगाड़ी पर चढ़कर'*

चम्पिया की भीगी पलकों पर एक बँद आँसू आ गया ।

बिरजू का भी दिल भर आया । उसने मन-ही-मन इमली पर रहनेवाले जिन बाबा को एक बंगन कबूला, गाछ का सबसे पहला बैगन, उसने खुद जिस पौधे को रोपा है !*' "जल्दी से गाड़ी लेकर बप्पा को भेज दो, जिनवाबा !/ ,

मढ़या के अन्दर बिरजू की माँ चटाई पर पड़ी करवटें ले रही थी। “हूँ, पहले से किसी बात का मनसूबा नहीं बाँधना चाहिए किसी को ! भगवान ने मनसूबा तोड़ दिया। उसको सबसे पहले भगवान से पूछना है, यह किस चूक का फल दे रहे हो भोला बाबा ! अपने जानते उसने किसी देवता-पित्तर की मानमनौती बाक़ी नही रखी। सर्वे के समय जमीन के लिए जितनी मनौतियाँ की थी*** ठीक ही तो ! महावीरजी का रोट तो बाक़ी ही है। हाय रे देव !*' 'भूल-चूक माफ़ करो महावीर बाबा ! मनोती दूनी करके चढ़ाएगी बिरज्‌ की माँ (***'

बिरजू की माँ के मन में रह-रहकर जंगी की पुतोह की बातें चुभती हैं, भकभक्‌ बिजली बत्ती !'' 'चोरी-चमारी करनेवाले की बेटी-पुतोह जलेगी नही ! पाँच बीघा ज़मीन क्या हासिल की है बिरज्‌ के बप्पा ने, गाँव की भाईखोौकियों की आँखों मे किरकिरी पड़ गयी है । खेत मे पाट लगा देखकर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी; धरती फोड़कर पाट लगा है; वेशाखी बादलों की तरह उमड़ते आ रहे है पाट के पौधे ! तो अलान तो फलान ! इतनी आँखों की धार भला फसल सहे ! जहाँ पन्द्रह मन पाट होना चाहिए, सिर्फ़ दस मन पाट कंटा पर तौल के ओजन हुआ रब्बी भगत के यहाँ ।' *'

“इसमे जलने की क्या बात है भला !''बिरजू के बप्पा ने तो पहले ही कुर्मा टोली के एक-एक आदमी को समझा के कहा था, जिन्दगी-भर मजदूरी करते रह जाओगे । सर्वे का समय आ रहा है, लाठी कड़ी करो तो दो-चार बीघें ज़मीन हासिल कर सकते हो । सो गाँव की किसी पुतखौकी का भतार सर्वे के समय बाबू साहेब के ख़िलाफ़ खाँसा भी नही ।'''बिरजू के बप्पा को कम सहना पड़ा है ! बाबू साहेब गुस्से में सरकस नाच के बाघ की तरह हुमड़ते रह गये। उनका बड़ा बेटा

घर में आग लगाने की धमकी देकर गया।'''आखिर बाबू साहेब ने अपने सबसे छोटे लड़के को भेजा । बिरज्‌ की माँ को 'मौसी' कह के पुका रा-- यह ज़मीन बाबूजी ने मेरे नाम से खरीदी थी । मेरी पढ़ाई-लिखाई उसी ज़मीन की उपज से चलती है। ' "और भी कितनी बातें। खूब मोहना जानता है उत्ता ज़रा-सा लड़का। जमीदार का बेटा है कि'**

चम्पिया, बिरजू सो गया क्या ? यहाँ आ जा बिरजू, अन्दर | तू भी आ जा, चम्पिया ।' ' “भला आदमी आवे तो एक बार आज !'

बिरजू के साथ चम्पिया अन्दर चली गयी ।

'ढिबरी बुझा दे ।' 'बप्पा बुलाएँ तो जवाब मत देना । खपच्ची गिरा दे ।”

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