शापित राजकुमारी
By: Ashwini Ingle
By: Ashwini Ingle
"मुझे बहुत ड़र लग रहा है विनय, पता नही इस तरह घर से भाग कर हम सही कर रहे है या नही। अबतक तो पापा को भी पता चल गया होगा की मैं घर में नही हूँ।"
भागते भागते ही माहिरा ने विनय से कहा।
"अंकल को ख़बर होने से पहले हमें यहाँ से निकलना होगा। मगर तुम घबराओ मत। क्यों ड़र रही हो? देखो, जबतक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें कोई कुछ नहीं कर सकता। भरोसा रखो, मैं तुम्हें कुछ नही होने दूँगा।"
माहिरा को हिम्मत देते हुए विनय उससे कहने लगा।
विनय की बातें सुनकर माहिरा के घबराएं हुए चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट आ गयी। तभी विनय की नज़र सामने खड़े एक आदमी पर गई। वह अचानक रुक गया और उसने माहिरा का हाथ पकड़कर उसे रास्ते में खड़ी एक गाड़ी के पीछे खींच लिया।
अचानक ऐसा क्या हुआ, माहिरा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह विनय से इस बारे में पूँछने ही वाली थी की विनय ने उसके होठों पर अपना हाथ रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया। मौका मिलते ही विनय बड़ी ही सावधानी से माहिरा को वहाँ से दूसरी जगह पर लेकर गया।
"मुझे लगता है अंकल को तुम्हारे घर में ना होने की ख़बर लग गई है।"
विनयने हाँफते हुए माहिरा से कहा।
"तुम इतने कॉन्फिडेंस से कैसे कह सकते हो?"
माहिरा ने विनय से पूछा।
"क्योंकि जब मैंने तुम्हें उस गाड़ी के पीछे की तरफ खींचा था तब सामने जो आदमी था उसे मैंने कई बार अंकल के साथ देखा था। हो न हो, अंकल ने जरूर उस आदमी को तुम्हे ढूंढने के लिए भेजा होगा। हमें बहुत सावधानी से कदम उठाना पड़ेगा।"
माहिरा की बात का जवाब देते हुए विनय ने कहा।
"मुझे लगता है कि हमें रात होने तक कही छिप जाना चाहिए। जैसे से रात हो जाएगी, हम अँधेरे का फायदा उठाते हुए मुंबई की तरफ़ निकल जाएंगे।"
माहिरा का यह सुझाव विनय को भी पसंद आया।
"मगर हम जाएंगे कहाँ? बस यही समझ नही आ रहा।" माहिरा ने दूसरे ही क्षण में अपने मन की आशंका को विनय के सामने रख दिया।
"मैं जानता हूँ एक जगह, जहाँ हमे कोई नही ढूंढ सकता।"
थोड़ी देर सोचने के बाद विनय ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ माहिरा से कहा और उसे लेकर विनय उस जगह पर पहुँच गया।
वहां जाने पर माहिरा बड़े ही आश्चर्य से कभी विनय की तरफ और कभी उस जगह को देखने लगी।
"क्या हुआ माहिरा? तुम ऐसे क्यों देख रही हो?"
माहिरा को अपनी तरफ देखता हुआ पा कर विनय ने उससे पूछा।
"राजभवन... तुम... तुम जानते भी इस जगह के बारे में?"
ऐसा कहते वक़्त माहिरा के चेहरे पर घबराहट भरे भाव साफ़ दिखाई दे रहे थे।
"देखो, इस वक़्त इस जगह से बढ़कर इस शहर में कोई और जगह नहीं है जहाँ हम बेफिक्र होकर छिप सकेंगे।"
विनय ने माहिरा की तरफ़ देखते हुए कहा।
"हम... यहाँ... कैसे... कैसे रुक सकते है? मुझे लगता है... मुझे लगता है कि हमे कही और... किसी और जगह जाना चाहिए। विनय... विनय... मैंने एक बार अख़बार में पढ़ा था कि यह जगह बड़ी ही डरावनी है। साथ ही साथ ये भी पढ़ा था कि... की यहाँ जानेवाला कोई भी इंसान... फिर लौटकर नहीं आया है। हमे यहाँ नही रुकना चाहिए विनय।"
माहिरा ने ड़रते हुए उस जगह पर रुकने से लगभग इंकार कर दिया।
"मुझे सब पता है, मैंने भी अख़बार में इस जगह के बारे में पढ़ा हुआ है। और इसलिए मैंने इस जगह का चुनाव किया है। हमें कुछ देर इसी जगह रुकना चाहिए।"
माहिरा को समझाते हुए विनय बोला।
"मगर क्यों विनय? इस जगह के बारे में सब पता होकर भी तुम यहाँ क्यों रुकना चाहते हो?"
माहिरा ने एक और सवाल विनय के सामने रख दिया।
"अरे बाबा... जिस तरह तुम इस जगह से ड़र रही हो वैसे और भी कई लोग ड़रते है। कोई सोच भी नही सकता कि हम यहाँ छुपे होंगे। हम आराम से यहां रुक सकेंगे।"
विनय अपनी बात माहिरा से कहने लगा।
"मगर और लोगों की तरह हम भी फिर वापस नहीं आ पाएं तो?? कही हमें कुछ हो गया तो??"
ऐसा कहते हुए माहिरा ने घबराकर विनय का हाथ पकड़ लिया।
माहिरा के हाथ पर हाथ रखते हुए विनय कहने लगा, "भरोसा रखो माहि, हमे कुछ नहीं होगा। तुम्हे पता न हो तो एक बात बता देता हूँ, प्रॉपर्टी को कोई कब्ज़ा ना कर सके इस वजह से कुछ लोग ऐसी झूठी अफवाएं फ़ैलाते है। और ये अख़बारवाले तो मिर्च मसाला लगाकर छपवाते भी है। ये बात भी कुछ वैसी ही होगी। और आगे जो होगा वो देखा जायेगा फ़िलहाल हमें इससे सुरक्षित जगह मिलेगी नहीं। क्या तुम्हें मेरी बातों पर भरोसा नहीं है?"
विनय की कही बातों पर यकीन रख कर माहिरा राजभवन में छिपने के लिए तैयार हो गई। फिर दोनों साथ में राजभवन के अंदर जाने लगे।
जैसे ही वे दरवाजे तक पहुंचे तो दो पल के लिए वही रुक गए। अपने आप ही उनके मुँह से शब्द निकल आए, "वाओ... कितना सुंदर दरवाजा है।"
विनय- लगता है काफ़ी पुराना है।
माहिरा- फिर भी देखो ना कितना मजबूत दिखाई देता है।
विनय- तुमने इसका डिझाईन देखा? कितना यूनिक लग रहा है, है ना?
माहिरा- सच में विनय, ये कारीगिरी बेहद ख़ूबसूरत लग रही है। इसके ऊपर के ये हाथी और घोड़े... कितने सुंदर है। आजकल के ज़माने में इतनी अच्छी कारीगिरी कहाँ देखने मिलती है।
विनय- अभी क्या हम यही रुकेंगे, दरवाज़े के बाहर ही? अंदर भी तो चलो, हो सकता है कि हमे कुछ और भी देखने मिल जाएं। और हां... कुछ देखने मिले ना मिले मगर हम इस तरह से बाहर खड़े रहेंगे तो कोई न कोई हमें जरूर देख लेगा।
विनय और माहिरा, दोनों ने राजभवन में प्रवेश कर लिया। अंदर का नज़ारा देख कर दोनों हक्के-बक्के रह गए। उन्हें अंदर काफ़ी सारी मूर्तियां दिखाई दी। उन मूर्तियों को देख ऐसा लग रहा था मानो वे मूर्तियां नहीं बल्कि इंसान हो। बहुत ही सुंदर कारीगरी थी उन मूर्तियों की।
इधर-उधर नज़र फेरकर दोनों ने अंदर की सारी जगह को देख लिया। ऐसे ही देखते देखते दोनों की पीठ एक दूसरे से टकरा गयी और वो जोर से चिल्लाए। फिर एक-दूसरे का एहसास होते ही बेवज़ह डरने की वजह से हँस पड़े।
"कितने बुद्धू है ना हम लोग, ख़ामख़ा ही ड़र रहे थे और अब तो हद ही हो गयी, ख़ुद से ही ड़र रहे है।"
माहिरा ने हँसते हुए विनय से कहा।
"ये बात तो तुमने बिल्कुल सही कही माहि। ख़ामख़ा ही ड़र गए हम। मगर यहाँ आने पर लगता नहीं है न की ये कोई पूरानी जगह होगी?"
विनय ने आसपास नज़र घुमा के माहिरा से अपनी शंका ज़ाहिर की।
"हां विनय... हमने तो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया। यहाँ पर ना तो धूल है और ना ही गंदगी। इस जगह को देखकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि ये जगह डरावनी होगी। मतलब... तुमने जो कहा था वो सही है।"
माहिरा ने विनय की बात का समर्थन करते हुए कहा।
"हो सकता है कि ये जिसकी प्रॉपर्टी है वो कहीं और रहता हो और यहाँ का ध्यान रखने के लिए उसने इस तरक़ीब का इस्तेमाल किया हो। ताकि लोग उस अख़बारवाली बात को सच समझकर यहाँ आए ही ना। अच्छा वो सब छोड़ो और यहाँ बैठो मेरे पास। रात होने में अभी समय है।"
कहते हुए विनय ने माहिरा को आराम करने का सुझाव दिया।
माहिरा विनय के बाजू में बैठ गयी और विनय से कहने लगी-
"थैंक यू विनय... तुमने मेरे लिए जो किया वो कोई भी नहीं कर सकता। लोग अपनी शादी से भाग जाते है जैसे की मैं भाग रही हूँ। मगर कितनी अज़ीब बात है ना... तुम अपनी ही दुल्हन को अपनी ही शादी से भगा रहे हो, सिर्फ इसलिए ताकि मैं अपना सपना पूरा कर सकू।"
"कितनी बार मैंने तुमसे कहा है, चाहे कुछ भी हो जाएं... सबसे पहले हम अच्छे दोस्त है और हमेशा हमारा रिश्ता इसी तरह रहेगा। मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ, चाहे तो आज़माकर देख लो।"
"बचपन से तुम्हारी आँखों में मैंने एक सपने को देखा है। वो सपना जो तुम्हारी जिंदगी में सबसे अधिक महत्व रखता है। तुम स्क्रिप्ट राइटर बनना चाहती थी और अपनी लिखी स्क्रिप्ट का सिनेमा जबतक बन नहीं जाता तबतक तुम शादी के बंधन से दूर रहना चाहती हूँ। फिर मैं तुम्हारा सपना अधूरा कैसे रहने दू?"
विनय ने माहिरा से कहा।
"तुम मेरी हिंमत हो विनय और मैं चाहती हूँ की हमेशा तुम इसी तरह मेरे साथ रहो।"
कहकर माहिरा ने विनय के कंधे पर अपना सर रखा।
बहुत सी भागदौड़ होने के कारण माहिरा थक़ गयी थी। कुछ ही देर में उसकी आँख लगी और वो विनय के कंधे पर सर रखे हुए ही सो गयी।
माहिरा के सोने के बाद काफ़ी देर तक विनय उसका चेहरा निहार रहा था। वो मन ही मन सोच रहा था कि माहिरा का हर सपना वो पूरा करेगा। उसपर कोई भी आंच नहीं आने देगा। ऐसा सोचते सोचते उसकी भी आँख लग गयी। दोनों काफ़ी देर तक सोते रहे।
कुछ समय बाद...
"मुझे लगता है काफी देर हो गयी। अब तो रात भी हो चुकी है और अँधेरा भी हो गया है। अब हम निकल सकते है।"
ऐसा कहकर विनय ने माहि को उठने को कहा। मगर जब उसने अपने मोबाइल की टॉर्च लगाई तो देखा की माहिरा वहां नहीं थी।
माहिरा को वहां ना पाकर विनय बहुत घबरा गया। जोर जोर से माहिरा को आवाज देने लगा।
"माहि... माहि... कहाँ हो तुम माहि? देखो ये वक़्त मजाक का नहीं है। हमें पहले ही काफी देर हो गयी है और अब और देर नहीं करनी चाहिए। रात के दस बजे है और अब नहीं निकले यहाँ से तो मुश्किल हो जायेगी।"
बहुत देर आवाज लगाने पर और इधर उधर ढूंढने पर भी जब माहि का कुछ पता नहीं चला तो विनय अंदर से घबरा गया। एक मूर्ती के पास बैठ कर रोने लगा।
तभी उसका ध्यान एक चमकती हुयी किसी चीज़ पर पड़ा जो की टॉर्च के उजाले से चमक रही थी।
विनय उसके पास गया और वो क्या है ये देखने लगा। देखने पर पता चला की वो किसीका झुमका था। उस झुमके को हाथ में उठाकर देखा तो विनय को याद आया की वो झुमका माहिरा का ही है जो विनय ने उसे तोहफे में दिया था।
उसके बाद विनय की घबराहट और बढ़ गयी। उसके मन में ख़याल आया की शायद माहिरा के पापा को उन दोनों का पता तो नही चला। या फिर वो ही माहिरा को वहाँ से ले गए हो।
विनय के मन में माहिरा को लेकर काफी सारे सवाल आ रहे थे मगर किसी भी सवाल का जवाब अबतक उसे मिल नहीं पाया था।