Create Your Account

Already have an account? Sign in
Funny loading GIF Google icon Continue with Google
By clicking "signup" you agree to our Terms of Service & Privacy Policy.
Continue without signup? explore
Loading...

Unfolding stories, please wait...

Start Reading Now
Tip: Scroll mouse wheel to Zoom In/Out the Book!
Loading...
forntFrame Cover Image

साया अतीत का प्रतिशोध

By: Mohit Pandey

कहानी का सारांश (Plot Outline): शिमला की वादियों में मशहूर उद्योगपति 'विक्रम सिंह' की उनके ही फार्महाउस में हत्या हो जाती है। कमरा अंदर से बंद था और बाहर ताजी बर्फ पर कोई पैरों के निशान नहीं थे। इस केस को सुलझाने के लिए दिल्ली से सस्पेंडेड पुलिस अफसर कबीर को बुलाया जाता है, जिसका इस शहर से एक गहरा और दर्दनाक अतीत जुड़ा है। क्या कबीर कातिल को ढूंढ पाएगा, या वह खुद शिकार बन जाएगा?

 

अध्याय 1: खामोश चीख (Chapter 1: The Silent Scream)

शिमला की रात हमेशा की तरह सर्द थी, लेकिन आज हवा में कुछ अलग ही कड़वाहट घुली हुई थी। दिसंबर की 24 तारीख। बाहर बर्फ गिर रही थी, जैसे आसमान खुद इस शहर के गुनाहों को सफेद चादर से ढकने की कोशिश कर रहा हो।

'विक्रम विला' एक पुराना, अंग्रेजों के ज़माने का बना हुआ बंगला था, जो शहर के शोर-शराबे से दूर, घने देवदार के जंगलों के बीच अकेला खड़ा था। रात के 2 बज रहे थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि गिरती हुई बर्फ की आवाज़ भी सुनी जा सकती थी।

अचानक, विला के पहली मंजिल के एक कमरे से कांच टूटने की तेज आवाज़ आई।

छन-पाक!

नीचे चौकीदार, रामू, जो अंगीठी के पास ऊंघ रहा था, हड़बड़ा कर उठ गया। "साहब?" उसने डरते हुए आवाज़ लगाई। कोई जवाब नहीं आया। बस, जंगल से आती हुई हवा की सांय-सांय। रामू ने अपनी लाठी उठाई और सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। उसके पुराने घुटने हर सीढ़ी पर चटक रहे थे, लेकिन डर ने उसे जकड़ रखा था।

विक्रम सिंह के कमरे का दरवाज़ा बंद था। रामू ने कांपते हाथों से दरवाज़ा खटखटाया। "मालिक? सब ठीक है?"

सन्नाटा।

रामू ने हैंडल घुमाया। दरवाज़ा अंदर से लॉक था। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर कंधा दरवाज़े पर मारा। एक बार, दो बार... और तीसरी बार में पुरानी लकड़ी चटक गई। दरवाज़ा खुला और रामू अंदर गिरा।

जैसे ही उसने नज़र उठाई, उसके हलक से एक चीख निकलकर वहीँ जम गई।

सामने की दीवार पर खून के छींटे थे। कमरे की बड़ी खिड़की टूटी हुई थी और ठंडी हवा अंदर आ रही थी। और बीचों-बीच, अपनी महंगी लेदर की कुर्सी पर विक्रम सिंह बैठे थे—या यूँ कहें, उनकी लाश बैठी थी। उनकी गर्दन एक अजीब कोण पर मुड़ी हुई थी और आँखों में ऐसा खौफ था, जैसे उन्होंने मौत को साक्षात् देख लिया हो।

रामू पीछे हटा, उसका पैर किसी चीज़ से टकराया। उसने नीचे देखा। वह एक पुराना, धूल जमा हुआ 'म्यूजिक बॉक्स' था, जिसमें से एक धीमी, डरावनी धुन बजनी शुरू हो गई थी।

रामू ने कांपते हाथों से अपनी जेब से फोन निकाला और 100 नंबर डायल किया। उसकी सांसें फूल रही थीं। "हेलो... पुलिस? खून... यहाँ खून हुआ है! विक्रम विला में... साहब मर गए!"

दिल्ली में, कबीर अपने छोटे से फ्लैट की बालकनी में खड़ा सिगरेट पी रहा था। रात के 3 बज चुके थे, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। पिछले 6 महीनों से, जब से उसे सस्पेंड किया गया था, रातें उसके लिए सबसे बड़ी दुश्मन बन गई थीं।

तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर नाम फ्लैश हुआ—IG माथुर।

इतनी रात को IG का फोन? कबीर ने सिगरेट बुझाई और फोन उठाया। "जय हिंद सर।"

"कबीर, पैकिंग कर लो," माथुर की आवाज़ गंभीर थी, उसमें आदेश और विनती दोनों का मिश्रण था।

"सर? मैं सस्पेंडेड हूँ," कबीर ने रूखेपन से कहा।

"मुझे पता है। लेकिन यह केस ऑफ-द-रिकॉर्ड है। शिमला में विक्रम सिंह का मर्डर हुआ है। लोकल पुलिस इसे संभाल नहीं पाएगी। और... जिस तरीके से मर्डर हुआ है, वह साधारण नहीं है।"

कबीर ने शिमला का नाम सुनते ही अपनी मुट्ठी भींच ली। शिमला—वह शहर जहाँ उसने अपना सब कुछ खोया था। "मैं वहां नहीं जा सकता सर। आप जानते हैं क्यों।"

"कबीर," माथुर की आवाज़ नरम हुई। "वहां से जो शुरूआती रिपोर्ट मिली है, उसमें एक चीज़ का ज़िक्र है। मौका-ए-वारदात पर एक सिंबल मिला है। एक काली तितली (Black Butterfly) का निशान।"

कबीर का खून जम गया। काली तितली। वही निशान जो 5 साल पहले उसकी पत्नी की हत्या वाली जगह पर मिला था। वह सीरियल किलर जिसे मरा हुआ मान लिया गया था।

"गाड़ी आधे घंटे में नीचे होगी," माथुर ने कहा और फोन काट दिया।

कबीर ने अंधेरे में घूरते हुए फोन को टेबल पर रखा। उसका अतीत, जिसे वह दफन कर चुका था, अपनी कब्र से बाहर निकल आया था। उसने अपनी अलमारी खोली और अपनी पुरानी रिवॉल्वर निकाली।

शिमला अब सिर्फ एक हिल स्टेशन नहीं था। अब वह एक कुरुक्षेत्र था। और यह युद्ध सिर्फ एक कातिल को पकड़ने का नहीं, बल्कि अपने ही साये से लड़ने का था।

गाड़ी की हेडलाइट्स ने कोहरे को चीरा और कबीर ने एक लंबी सांस ली। खेल शुरू हो चुका था।

 

 

अध्याय 2: बंद कमरे का रहस्य (Chapter 2: The Mystery of the Locked Room)

 

अगली सुबह, शिमला एक सफ़ेद चादर में लिपटा हुआ था। कबीर जब 'विक्रम विला' पहुंचा, तो वहां पहले से ही पुलिस की गाड़ियां मौजूद थीं। लोकल इंस्पेक्टर राणा उसे देखते ही मुंह बनाने लगा। राणा और कबीर की पुरानी रंजिश थी।

"अरे, तो दिल्ली वाले साहब आ ही गए," राणा ने तंज कसा। "सुना है आजकल घर पर बैठे हो?"

कबीर ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और सीधे क्राइम सीन की तरफ बढ़ा। "लाश कहां है?"

"पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई," राणा ने कहा, कबीर के पीछे-पीछे आते हुए। "लेकिन कमरा वैसे ही सील है।"

कबीर ने कमरे में कदम रखा। खून की गंध अभी भी हवा में थी। उसने कमरे का मुआयना शुरू किया।

दरवाज़ा: अंदर से लॉक था। रामू ने इसे तोड़ा था।

खिड़की: टूटी हुई थी। लेकिन खिड़की के नीचे, बाहर ज़मीन पर ताज़ी बर्फ थी। अगर कोई खिड़की से कूदता, तो बर्फ पर निशान ज़रूर होते। लेकिन वहां कोई निशान नहीं थे।

चिमनी: इतनी संकरी कि कोई बच्चा भी नहीं आ सकता।

"राणा," कबीर ने खिड़की से बाहर देखते हुए पूछा, "कल रात बर्फ कब गिरनी शुरू हुई थी?"

"शाम को 7 बजे से लगातार गिर रही थी," राणा ने जवाब दिया। "हत्या रात 2 बजे के आसपास हुई। अगर कातिल बाहर से आता या जाता, तो बर्फ पर पैरों के निशान ज़रूर होते। लेकिन घर के चारों तरफ की बर्फ एकदम साफ है।"

"यानी कातिल हवा में उड़कर आया और उड़कर चला गया?" कबीर ने व्यंग्य किया।

वह विक्रम सिंह की मेज के पास गया। वहां एक डायरी रखी थी, जो खुली हुई थी। लेकिन पन्ने कोरे थे। कबीर ने गौर से देखा। पन्ने पर पेन की नोक के निशान थे, जैसे किसी ने कुछ लिखा हो लेकिन स्याही नहीं चली।

"पेंसिल है?" कबीर ने पूछा। एक हवलदार ने उसे पेंसिल दी। कबीर ने पन्ने पर हल्के हाथ से पेंसिल रगड़ी (Shading)। धीरे-धीरे, कागज पर दबे हुए शब्द उभरने लगे।

वहाँ सिर्फ एक शब्द लिखा था: "वह लौट आया है।" (He has returned).

तभी कबीर की नज़र कोने में पड़ी एक छोटी सी चीज़ पर गई। दीवार पर खून के छींटों के पास, बहुत बारीक नक्काशी की हुई एक छोटी सी काली तितली बनी हुई थी। यह पेंट नहीं था, इसे दीवार पर उकेरा गया था।

कबीर के दिमाग में फ्लैशबैक कौंध गया। उसकी पत्नी, रिया, का खून से लथपथ चेहरा।

"सर!" हवलदार की आवाज़ ने उसे वर्तमान में खींचा। "चौकीदार रामू को होश आ गया है। वह कुछ बड़बड़ा रहा है।"

कबीर तुरंत नीचे दौड़ा। रामू एक कंबल में लिपटा कांप रहा था। "रामू, कल रात तुमने क्या देखा?" कबीर ने सख्ती से पूछा।

रामू ने डरी हुई आँखों से कबीर को देखा। "साहब... परछाई। वह आदमी नहीं था... वह परछाई थी। उसने मास्क पहन रखा था... जोकर का नहीं... शैतान का।"

"वह कमरे से बाहर कैसे गया?"

"वह बाहर नहीं गया साहब," रामू ने जो कहा, उसने वहां मौजूद हर पुलिसवाले के रोंगटे खड़े कर दिए। "जब मैंने दरवाज़ा तोड़ा... तो कमरे में विक्रम साहब के अलावा कोई नहीं था। लेकिन खिड़की टूटने की आवाज़ मेरे दरवाज़ा तोड़ने से पहले आई थी।"

कबीर की भौहें तन गईं। "मतलब कातिल कमरे के अंदर ही था जब तुमने दरवाज़ा तोड़ा?"

"नहीं साहब," रामू रोने लगा। "कमरा खाली था। बस वो धुन बज रही थी।"

कबीर वापस ऊपर वाले कमरे की तरफ भागा। अगर कातिल बाहर नहीं गया, और दरवाज़ा टूटने पर अंदर नहीं था, तो वह कहां गया?

उसने कमरे को फिर से स्कैन किया। उसकी नज़र टूटी हुई खिड़की के कांच के टुकड़ों पर पड़ी। कांच के टुकड़े अंदर की तरफ गिरे थे, बाहर नहीं।

"राणा!" कबीर चिल्लाया। "खिड़की बाहर से नहीं तोड़ी गई। खिड़की अंदर से तोड़ी गई है!"

"तो?" राणा ने उलझन में पूछा।

"इसका मतलब है," कबीर की आँखों में चमक आ गई, "कातिल ने विक्रम सिंह को मारा, खिड़की तोड़ी ताकि हमें लगे कि वह भाग गया, और फिर..." कबीर ने कमरे में मौजूद एक बड़ी, प्राचीन अलमारी (Wardrobe) की तरफ देखा।

"...और फिर वह यहीं छुप गया।"

राणा ने तुरंत अपनी पिस्तौल निकाल ली। "क्या वह अभी भी..."

"नहीं," कबीर ने अलमारी के पास जाकर देखा। वह खाली थी। लेकिन अलमारी के पीछे की दीवार पर हल्की सी दरार थी। कबीर ने अलमारी को जोर से धक्का दिया। अलमारी खिसक गई और उसके पीछे एक गुप्त रास्ता (Secret Passage) दिखाई दिया।

अंधेरे गलियारे से ठंडी और सड़ी हुई हवा आ रही थी। "तो विक्रम सिंह अपने ही घर के राज़ का शिकार बन गए," कबीर ने टॉर्च जलाई। "राणा, बैकअप बुलाओ। मैं अंदर जा रहा हूँ।"

कबीर अंधेरे में कदम रखने ही वाला था कि उसका फोन बजा। अज्ञात नंबर (Unknown Number).

उसने फोन उठाया। "हेलो?"

उधर से एक मशीनी, भारी आवाज़ आई: "स्वागत है कबीर। मुझे लगा ही था तुम आओगे। खेल का नियम याद है ना? अगर तुम जीते, तो सच मिलेगा। अगर मैं जीता... तो एक और लाश।"

फोन कट गया।

 

अध्याय 3: दफन सच (Chapter 3: The Buried Truth)


सुरंग में हवा किसी पुराने कब्रगाह की तरह भारी और सड़ी हुई थी। कबीर ने अपनी टॉर्च की रोशनी आगे फेंकी। दीवारों पर सीलन थी और जगह-जगह मकड़ी के जाले लटक रहे थे। यह कोई साधारण गुप्त रास्ता नहीं था; यह 'विक्रम विला' की नींव में छिपा एक पुराना कोठरी-नुमा रास्ता था, जिसे शायद बरसों से किसी ने इस्तेमाल नहीं किया था—सिवाय उस कातिल के।

"राणा, तुम ऊपर रहो। अगर कोई बाहर निकले तो गोली चलाने में हिचकिचाना मत," कबीर ने पीछे मुड़कर कहा और अंधेरे में उतर गया।

करीब पचास कदम चलने के बाद, सुरंग एक छोटे से भूमिगत कमरे (Underground Chamber) में खुली।

वहां जो नज़ारा था, उसे देखकर कबीर के भी रौंगटे खड़े हो गए। यह कमरा किसी ऑफिस जैसा लग रहा था, लेकिन बेहद पुराना। बीच में एक लकड़ी की मेज थी और दीवारों पर... तस्वीरें।

सैकड़ों तस्वीरें।

कबीर ने करीब जाकर देखा। ये तस्वीरें 'काली तितली' के शिकारों की नहीं थीं। ये तस्वीरें बच्चों की थीं। एक अनाथालय की तस्वीरें। हर तस्वीर के नीचे एक तारीख और एक कोड लिखा था। और सबसे बड़ी तस्वीर बीच में थी—जिसमें विक्रम सिंह एक ग्रुप फोटो में मुस्कुरा रहे थे, और उनके पीछे एक बैनर लगा था: "होप अनाथालय - शिमला, 1995"।

"होप अनाथालय..." कबीर बड़बड़ाया। यह वही अनाथालय था जो 15 साल पहले एक रहस्यमयी आग में जलकर खाक हो गया था। पुलिस ने इसे हादसा माना था।

मेज पर एक डायरी रखी थी। कबीर ने उसे खोला। उसमें पैसों का हिसाब नहीं था, बल्कि इंसानों का हिसाब था। विक्रम सिंह सिर्फ एक उद्योगपति नहीं थे; वह इस अनाथालय की आड़ में कुछ बहुत घिनौना काम कर रहे थे। मानव तस्करी? या कुछ और?

तभी कबीर की नज़र डायरी के आखिरी पन्ने पर पड़ी। वहां ताजी स्याही से कुछ लिखा था। कातिल ने यह संदेश कबीर के लिए छोड़ा था।

"पाप कभी मरते नहीं, कबीर। वे बस परछाई बन जाते हैं। विक्रम सिंह पहला था। सूची लंबी है।"

कबीर ने डायरी जेब में रखी। उसे समझ आ गया था कि कातिल कोई साधारण अपराधी नहीं है। वह एक 'विजिलांते' (Vigilante) है—जो बदला ले रहा है।

वह आगे बढ़ा। सुरंग का दूसरा सिरा जंगल में एक सूखी हुई बावड़ी (Stepwell) में निकलता था। कबीर जब बाहर निकला, तो उसने देखा कि वह विला से करीब 500 मीटर दूर था। यहाँ बर्फ पर ताजे पैरों के निशान थे जो जंगल की गहराई में जा रहे थे।

"तो कातिल उड़कर नहीं गया," कबीर ने खुद से कहा। "वह ज़मीन के नीचे से गया था।"

तभी उसका फोन वाइब्रेट हुआ। राणा का कॉल था। "सर, आपको तुरंत वापस आना चाहिए। विक्रम सिंह की पत्नी और उनका बेटा आ गए हैं। और... एक और मुसीबत खड़ी हो गई है।"

 

 

अध्याय 4: शक की सुई (Chapter 4: The Needle of Suspicion)


जब कबीर वापस विला के लिविंग रूम में पहुंचा, तो माहौल तनावपूर्ण था। वहां तीन नए चेहरे मौजूद थे।

एक सोफे पर मल्लिका सिंह बैठी थी—विक्रम की दूसरी पत्नी। उम्र में विक्रम से काफी छोटी, शायद 30-32 साल की। वह रो नहीं रही थी, बस शून्य में घूर रही थी। उसकी आँखों में दुःख से ज्यादा डर दिखाई दे रहा था।

दूसरे सोफे पर आर्यन था—विक्रम का बिगड़ैल बेटा (पहली पत्नी से)। वह गुस्से में लग रहा था और पुलिसवालों पर चिल्ला रहा था। "मेरे पिता का मर्डर हुआ है और तुम लोग मुझसे ही सवाल पूछ रहे हो? क्या बकवास है ये!" आर्यन ने मेज पर हाथ पटका।

तीसरा व्यक्ति एक शांत, बुजुर्ग आदमी था—डॉ. सान्याल। विक्रम के फैमिली डॉक्टर और पुराने दोस्त।

कबीर ने कमरे में कदम रखा। उसकी वर्दी पर लगी धूल और चेहरे की गंभीरता ने आर्यन को चुप करा दिया। "इंस्पेक्टर राणा," कबीर ने शांत आवाज़ में कहा, "इन लोगों से परिचय करवाइए।"

राणा ने कबीर को एक फाइल पकड़ाई। "सर, ये मल्लिका जी हैं, ये आर्यन, और ये डॉक्टर सान्याल। और सर... पोस्टमार्टम की शुरुआती रिपोर्ट आ गई है।"

"क्या कहती है रिपोर्ट?" कबीर ने पूछा, लेकिन उसकी नज़रें मल्लिका के चेहरे पर टिकी थीं।

"विक्रम सिंह की गर्दन टूटने से पहले... उन्हें ज़हर दिया गया था," राणा ने बताया। "न्यूरोटॉक्सिन। ऐसा ज़हर जो इंसान को पैरालाइज़ (लकवाग्रस्त) कर देता है। यानी जब उनकी गर्दन तोड़ी गई, वे होश में थे, सब देख रहे थे, लेकिन हिल नहीं सकते थे।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। यह एक बेरहम मौत थी।

कबीर आर्यन की तरफ मुड़ा। "कल रात आप कहां थे, आर्यन?"

आर्यन थोड़ा हड़बड़ाया। "मैं... मैं कसौली में था। दोस्तों के साथ पार्टी कर रहा था। आप चेक कर सकते हैं।"

"वह झूठ बोल रहा है," मल्लिका अचानक बोल पड़ी। उसकी आवाज़ कांच की तरह ठंडी थी। "कल रात मैंने इसकी गाड़ी विला के पीछे वाले गेट पर देखी थी। रात के 1 बजे।"

"झूठी औरत!" आर्यन चिल्लाया। "तुम तो चाहती ही थी कि पिताजी मर जाएं ताकि सारी जायदाद तुम्हें मिल जाए! पुलिस वालों, इस पर नज़र रखो। इसका अफ़ेयर चल रहा है!"

"बस!" कबीर की आवाज़ ने दोनों को चुप करा दिया। "यह पुलिस इन्वेस्टिगेशन है, बिग बॉस का घर नहीं।"

कबीर डॉक्टर सान्याल के पास गया। "डॉक्टर, आप विक्रम को कब से जानते थे?"

"30 साल से," डॉक्टर ने रुमाल से पसीना पोंछा, हालांकि कमरे में ठंड थी। "विक्रम बीमार थे, लेकिन उन्हें कोई जानलेवा बीमारी नहीं थी। यह मर्डर... यह किसी पागल का काम है।"

"या किसी ऐसे का जो बहुत नफरत करता हो," कबीर ने कहा। उसने जेब से वह डायरी निकाली जो उसे सुरंग में मिली थी। "डॉक्टर, क्या आप 'होप अनाथालय' के बारे में कुछ जानते हैं?"

डॉक्टर का चेहरा पीला पड़ गया। उनके हाथ कांपने लगे। "नहीं... मैं... वह तो बहुत पहले जल गया था।"

कबीर ने उनकी घबराहट को नोट कर लिया। तभी, एक हवलदार दौड़ता हुआ आया। "सर! सर! विला के बाहर... गेट पर... कुछ मिला है।"

कबीर, राणा और बाकी सब बाहर दौड़े।

विला के मुख्य लोहे के गेट पर, बर्फ के ऊपर खून से एक बड़ा सा 'X' बनाया गया था। और वहां एक पुतला (Mannequin) लटका हुआ था। पुतले के गले में पुलिस की वर्दी का एक टुकड़ा था और उस पर एक नेमप्लेट लगी थी।

नेमप्लेट पर लिखा था: "कबीर"।

पुतले की जेब में एक नोट था: "दूसरा अध्याय शुरू हो चुका है, इंस्पेक्टर। अगला नंबर किसी और का नहीं... तुम्हारा है। 24 घंटे। अपनी सांसें गिन लो।"

राणा ने कबीर की तरफ देखा, उसका चेहरा डर से सफेद था। "सर, यह आपके पीछे पड़ा है।"

कबीर ने नोट को पढ़ा और उसकी आँखों में अंगारे दहक उठे। डर की जगह अब वहां सिर्फ संकल्प था। "नहीं राणा," कबीर ने अपनी बंदूक की मैगजीन चेक की। "वह मुझे डरा नहीं रहा। वह मुझे चुनौती दे रहा है। और मैं चुनौतियां हारता नहीं हूँ।"

उसने आसमान की तरफ देखा। बर्फबारी तेज़ हो गई थी। "टीम तैयार करो। हमें होप अनाथालय के खंडहरों में जाना है। जवाब वहीं मिलेंगे।"

 

अध्याय 5: राख में दबे राज़ (Chapter 5: Secrets Buried in Ash)


होप अनाथालय शहर के बाहरी इलाके में, एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित था। 15 साल पहले लगी आग ने उस भव्य इमारत को एक काले कंकाल में बदल दिया था। जली हुई लकड़ियाँ और ढह चुकी दीवारें अब भी उस रात की भयानक दास्तान सुना रही थीं।

कबीर और इंस्पेक्टर राणा जीप से उतरकर खंडहरों की तरफ बढ़े। शाम ढल चुकी थी और कोहरा इतना घना था कि 10 कदम आगे देखना भी मुश्किल था।

"सर, यहाँ आना सुरक्षित नहीं है," राणा ने अपनी जैकेट कसते हुए कहा। "लोग कहते हैं यहाँ उन बच्चों की आत्माएं भटकती हैं जो उस आग में जल गए थे।"

"आत्माएं डराती हैं राणा, लेकिन मारते ज़िंदा इंसान हैं," कबीर ने टॉर्च जलाई और जली हुई सीढ़ियों पर कदम रखा।

अंदर का नज़ारा दिल दहला देने वाला था। टूटे हुए खिलौने, जले हुए बिस्तर और कालिख पुती दीवारें। कबीर सीधे उस जगह गया जहाँ कभी एडमिनिस्ट्रेशन ऑफिस हुआ करता था। उसे उम्मीद थी कि शायद कोई रिकॉर्ड रूम, कोई तिजोरी आग से बच गई हो।

फर्श पर मलबे के ढेर को हटाते हुए कबीर को एक लोहे का दरवाज़ा दिखा, जो ज़मीन में धंसा हुआ था। "राणा, मदद करो," कबीर ने कहा।

दोनों ने मिलकर भारी मलबे को हटाया और ज़ंग लगे लोहे के दरवाज़े को खोला। नीचे जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं। यह एक तहखाना (Basement) था जो आग की लपटों से बच गया था।

अंदर बहुत बदबू थी। कबीर ने मुँह पर रुमाल रखा। कमरे में पुरानी फाइलें बिखरी पड़ी थीं। कबीर ने एक फाइल उठाई। उस पर लिखा था: "बैच 1995 - मेडिकल रिपोर्ट्स"।

कबीर ने पन्ने पलटे। हर पन्ने पर एक बच्चे का नाम, उसकी उम्र और... उसे दी गई दवाओं की लिस्ट थी। "हे भगवान," राणा की आवाज़ कांप गई। "सर, ये अनाथालय नहीं था। यह एक प्रयोगशाला (Lab) थी। वे इन अनाथ बच्चों पर नई दवाओं का टेस्ट कर रहे थे।"

कबीर की मुट्ठी भिंच गई। "विक्रम सिंह पैसे लगा रहा था, और डॉक्टर सान्याल..."

"...मेडिकल इंचार्ज था," एक फाइल कबीर के हाथ लगी जिस पर डॉ. सान्याल के हस्ताक्षर थे। "ये लोग बच्चों को गिनी-पिग की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। और जब कोई बच्चा मर जाता, तो उसे गायब कर देते।"

तभी, तहखाने के कोने से एक फोन की घंटी बजी। ट्रिंग... ट्रिंग...

वह एक पुराना लैंडलाइन फोन नहीं था, बल्कि वहां रखा एक मोबाइल था। कबीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा। मोबाइल एक कुर्सी पर रखा था। और कुर्सी पर... डॉक्टर सान्याल बैठे थे।

बंधे हुए।

कबीर लपका, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। सान्याल का गला रेता हुआ था। खून अभी भी ताज़ा था, यानी हत्या कुछ ही देर पहले हुई थी। उनकी शर्ट पर खून से वही निशान बना था—काली तितली।

और मोबाइल अभी भी बज रहा था। कबीर ने फ़ोन उठाया।

"देखा कबीर?" वही मशीनी आवाज़ गूंजी। "पाप का दूसरा हिस्सेदार भी गया। डॉक्टर ने बहुत से मासूमों को मारा था, आज उसे अपनी दवा मिल गई।"

"तुम कौन हो?" कबीर चिल्लाया। "सामने आओ कायरों की तरह क्यों छिप रहे हो?"

"पीछे मुड़ो, इंस्पेक्टर।"

कबीर और राणा बिजली की रफ़्तार से पीछे मुड़े। तहखाने के दरवाज़े पर एक आकृति खड़ी थी। काला लबादा, चेहरे पर एक डरावना मास्क और हाथ में एक जलती हुई मशाल।

इससे पहले कि कबीर अपनी पिस्तौल तान पाता, उस आकृति ने जलती हुई मशाल तहखाने के अंदर फेंकी। वहां पहले से ही पेट्रोल छिड़का हुआ था।

धूम!

एक धमाके के साथ आग की लपटें उठीं। "भागो राणा!" कबीर चिल्लाया।

 

अध्याय 6: शिकारी का जाल (Chapter 6: The Hunter's Trap)


आग पलक झपकते ही फ़ैल गई। पुरानी फाइलें और लकड़ियाँ बारूद की तरह जलने लगीं। बाहर निकलने का एक ही रास्ता था—वह सीढ़ियाँ जहाँ अब आग की दीवार खड़ी थी।

"सर, हम फंस गए!" राणा खांसते हुए चिल्लाया। धुआं उनका दम घोंट रहा था।

कबीर ने चारों तरफ देखा। ऊपर छत पर एक रोशनदान (Ventilation duct) था, लेकिन वह काफी ऊंचाई पर था। "राणा, वो लोहे की रैक पकड़ो!"

दोनों ने मिलकर भारी लोहे की रैक को दीवार से सटाया। कबीर पहले चढ़ा और अपनी कोहनी से रोशनदान की जाली तोड़ने लगा। आग की लपटें उनके जूतों तक पहुँच रही थीं।

"जल्दी सर!"

कबीर ने पूरी ताकत से लात मारी और जाली बाहर निकल गई। उसने राणा का हाथ पकड़ा और उसे ऊपर खींचा। दोनों किसी तरह रेंगते हुए बाहर घास पर गिरे, बुरी तरह खांसते हुए। उनके पीछे तहखाने से एक और धमाका हुआ। अगर वे एक मिनट और रुकते, तो ज़िंदा जल जाते।

लेकिन राहत की सांस लेने का वक़्त नहीं था।

"वह यहीं कहीं है," कबीर ने अपनी पिस्तौल निकाली और धुएं के बीच लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ। जंगल की तरफ बर्फ पर ताज़े पैरों के निशान थे।

कबीर ने दौड़ लगा दी। "रुक जाओ!"

काली आकृति पेड़ों के बीच भाग रही थी। वह इंसान बहुत तेज़ था, बर्फ पर ऐसे दौड़ रहा था जैसे उसे इस इलाके का चप्पा-चप्पा पता हो। कबीर ने हवा में गोली चलाई। "रुक जाओ वरना गोली मार दूंगा!"

वह आकृति रुकी नहीं। कबीर ने उसका पीछा जारी रखा। वे जंगल में बहुत अंदर आ चुके थे। अचानक, वह आकृति एक पेड़ के पीछे मुड़ी और गायब हो गई।

कबीर वहां पहुंचा, पिस्तौल तानकर। सन्नाटा। सिर्फ़ उसकी अपनी भारी सांसों की आवाज़।

तभी, उसके पीछे से एक छाया उभरी। कबीर पलटा, लेकिन तब तक एक लोहे की रॉड उसके हाथ पर पड़ी। पिस्तौल दूर जा गिरी। कबीर ने दर्द को नज़रअंदाज़ करते हुए हमलावर को एक मुक्का मारा।

मास्क वाला आदमी पीछे लड़खड़ाया, लेकिन उसने तुरंत एक चाकू निकाल लिया। दोनों के बीच गुत्थमगुत्था शुरू हो गई। कबीर पुलिस की ट्रेनिंग का इस्तेमाल कर रहा था, लेकिन हमलावर में जंगली ताकत थी।

लड़ाई के दौरान, कबीर ने हमलावर की कलाई पकड़ ली। वहां कलाई पर एक टैटू गुदा हुआ था—'007'। यह किसी एजेंट का नंबर नहीं, बल्कि किसी कैदी या मरीज का नंबर लग रहा था।

"तुम वही बच्चे हो ना?" कबीर ने संघर्ष करते हुए पूछा। "जो उस आग से बच गया था?"

हमलावर रुका। उसने अपनी गहरी, डरावनी आँखों से कबीर को देखा। "वह बच्चा मर गया, कबीर," आवाज़ इस बार मशीनी नहीं थी, बल्कि एक फटी हुई, दर्दनाक इंसानी आवाज़ थी। "जो बचा... वह सिर्फ प्रतिशोध है।"

हमलावर ने कबीर को धक्का दिया। कबीर का पैर फिसला और वह पहाड़ी की ढलान से नीचे लुढ़क गया। वह झाड़ियों और पत्थरों से टकराता हुआ नीचे गिरा और उसका सर एक चट्टान से टकराया।

अंधेरा छाने से पहले, कबीर ने देखा कि वह मास्क वाला आदमी ऊपर खड़ा उसे देख रहा था। उसने कबीर को मारा नहीं, बस छोड़ दिया।

"खेल अभी ख़त्म नहीं हुआ, इंस्पेक्टर," हवा में शब्द गूंजे।

जब कबीर की आँखें बंद हो रही थीं, उसके दिमाग में एक चेहरा कौंधा। वह टैटू... और वह आवाज़... उसने यह आवाज़ पहले कहीं सुनी थी। आज ही।

विक्रम विला में।

अध्याय 7: नकाब के पीछे (Chapter 7: Behind the Mask)


कबीर को जब होश आया, तो वह अस्पताल के बिस्तर पर था। उसके सिर में तेज़ दर्द हो रहा था। इंस्पेक्टर राणा पास ही कुर्सी पर ऊंघ रहा था।

"राणा!" कबीर ने गुर्राया, कैनुला नोचते हुए।

राणा हड़बड़ा कर उठा। "सर, आप होश में आ गए? डॉक्टर ने आराम करने को कहा है। आपको गहरी चोट लगी थी।"

"आराम करने का वक़्त नहीं है। वह अगला शिकार करने वाला है," कबीर बिस्तर से उतरा, उसका सिर चकरा रहा था लेकिन इरादे लोहे जैसे मज़बूत थे। "मुझे वो फाइल दिखाओ जो हम आग से बचा लाए थे।"

राणा ने जली हुई फाइल का बचा हुआ हिस्सा कबीर को दिया। कबीर ने पन्ने पलटे। ज़्यादातर जानकारी जल चुकी थी, लेकिन एक पन्ना आधा बचा था। उस पर एक धुंधली फोटो थी और एक कोड: 007।

तस्वीर एक 10 साल के बच्चे की थी। पतली, डरी हुई शक्ल। लेकिन उसकी आँखें... वे आँखें कबीर ने अभी हाल ही में देखी थीं।

कबीर ने तस्वीर के नीचे की तारीख और नाम पढ़ने की कोशिश की। नाम मिट चुका था, लेकिन 'एडॉप्शन डेट' (गोद लेने की तारीख) साफ थी—15 जनवरी 2005।

कबीर का दिमाग तेज़ी से चला। 2005... यही वो साल था जब विक्रम सिंह ने ऐलान किया था कि उनका बेटा 'आर्यन' बोर्डिंग स्कूल से वापस आ गया है।

"राणा," कबीर की आवाज़ ठंडी हो गई। "विक्रम सिंह का असली बेटा 2004 में मर गया था। एक बीमारी से। विक्रम ने अपनी कंपनी के शेयर और साख बचाने के लिए यह बात दुनिया से छिपाई।"

"क्या? तो फिर आर्यन कौन है?"

"आर्यन ही 007 है," कबीर ने फाइल बंद की। "विक्रम ने अनाथालय के उस बच्चे को चुना जिस पर उसकी दवाओं का असर हुआ था, जो सबसे मज़बूत था। उसने उसे गोद लिया, उसका नाम आर्यन रखा और उसे अपनी कठपुतली बना दिया। लेकिन वह भूल गया कि वह एक शेर के बच्चे को पाल रहा है।"

"लेकिन सर... आर्यन तो बिगड़ैल अमीरज़ादा लगता है। वह हत्यारा कैसे हो सकता है?"

"वह सब नाटक था। जंगल में उस मास्क वाले आदमी ने मुझसे कहा था—'वह बच्चा मर गया, कबीर।' यह वही दर्द था जो मैंने आर्यन की आवाज़ में सुना था जब वह विला में चिल्ला रहा था। वह अपने 'बाप' की मौत पर दुखी नहीं था, वह उस नर्क से आज़ादी का जश्न मना रहा था।"

कबीर ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर चेक की। "मल्लिका! अगला शिकार मल्लिका है। वह इस राज़ को जानती होगी।"

अध्याय 8: आखिरी शिकार (Chapter 8: The Last Victim)


रात का तूफान अपने चरम पर था। विक्रम विला की बिजली काट दी गई थी। पूरा घर अंधेरे में डूबा था, सिवाय बिजली की कड़कड़ाहट से होने वाली रोशनी के।

मल्लिका अपने बेडरूम में छिपी थी, हाथ में एक चाकू लिए। उसे पता था वह आने वाला है। उसने दरवाज़े पर भारी संदूक लगा रखा था।

अचानक, दरवाज़े पर दस्तक हुई। ठक... ठक... ठक...

"मल्लिका माँ..." बाहर से आर्यन की आवाज़ आई। एकदम शांत, सौम्य। "दरवाज़ा खोलो। मुझे डर लग रहा है।"

मल्लिका की सांसें अटक गईं। "चले जाओ यहाँ से! मुझे पता है तुम कौन हो!"

"ओह, तो तुम्हें पता चल गया?" आवाज़ बदल गई। अब वह भारी और डरावनी थी। "तब तो छुपने का कोई फायदा नहीं।"

धड़ाम!

दरवाज़ा एक ही झटके में टूट गया। भारी संदूक माचिस की डिब्बी की तरह उड़कर दूर जा गिरा। बिजली कड़की और मल्लिका ने देखा—दरवाज़े पर आर्यन खड़ा था। लेकिन उसके हाथ में शराब की बोतल नहीं, एक बड़ा शिकार करने वाला चाकू था। और उसकी कलाई पर वह टैटू साफ चमक रहा था: 007।

"तुमने उसे नहीं रोका, मल्लिका," आर्यन धीरे-धीरे आगे बढ़ा। "जब वह मुझे लैब में ले जाता था, सुइयां चुभाता था... तुम सब जानती थीं। तुम बस अपनी हीरों की अंगूठियों में व्यस्त थीं।"

"मुझे माफ़ कर दो! मैं डरी हुई थी!" मल्लिका पीछे खिसकते हुए दीवार से जा लगी।

"डर?" आर्यन हंसा, एक खोखली हंसी। "डर क्या होता है यह मैं तुम्हें दिखाता हूँ।"

उसने चाकू उठाया।

"हाथ ऊपर, आर्यन!"

खिड़की का कांच टूटते हुए कबीर अंदर कूदा, उसकी बंदूक सीधे आर्यन के सीने पर तनी थी। राणा दरवाज़े से अंदर आया।

आर्यन रुका। उसने कबीर की तरफ देखा और मुस्कुराया। "तुम देर से आए, इंस्पेक्टर।"

"खेल खतम, आर्यन," कबीर ने कहा, उसकी उंगली ट्रिगर पर थी। "तुमने अपने पिता को मारा, डॉक्टर को मारा। अब और नहीं।"

"पिता?" आर्यन की आँखों में आग थी। "वह पिता नहीं, राक्षस था! उसने मेरे असली माँ-बाप को अनाथालय की आग में जलवा दिया ताकि वह मुझे चुरा सके। उसने मुझे इंसान नहीं, एक एक्सपेरिमेंट बना दिया! मैंने जो किया, वह न्याय था!"

"तो कानून को अपना काम करने दो," कबीर ने समझाया। "मल्लिका को मारने से तुम्हें सुकून नहीं मिलेगा।"

"सुकून?" आर्यन ने अपनी शर्ट का बटन खोला। उसकी छाती पर जलने के और चीर-फाड़ के पुराने निशान थे। "सुकून मेरे लिए नहीं बना, कबीर। मैं तो बस सफाई कर रहा हूँ।"

उसने तेज़ी से मल्लिका की तरफ छलांग लगाई।

ठांय!

गोली चली।

 

अध्याय 9: बर्फ और खून (Chapter 9: Snow and Blood)


गोली मल्लिका को नहीं, आर्यन के कंधे पर लगी थी। कबीर ने जानबूझकर निशाना चूका दिया था ताकि उसे ज़िंदा पकड़ सके। आर्यन लड़खड़ाया, चाकू उसके हाथ से गिर गया।

लेकिन उसने हार नहीं मानी। घायल शेर की तरह वह कबीर पर झपटा। दोनों ज़मीन पर गिर पड़े। आर्यन में अमानवीय ताकत थी—उन दवाओं का असर जो सालों तक उस पर आज़माई गई थीं। उसने कबीर का गला पकड़ लिया।

कबीर की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा। "तुम नहीं समझोगे कबीर..." आर्यन गुर्राया। "तुम कानून के गुलाम हो।"

तभी, मल्लिका ने ज़मीन पर गिरा हुआ लैम्प उठाया और आर्यन के सिर पर दे मारा। आर्यन की पकड़ ढीली पड़ी। कबीर ने मौका पाकर उसे धक्का दिया और उसे ज़मीन पर जकड़ लिया (Pin down)। राणा ने तुरंत हथकड़ी लगा दी।

आर्यन ने संघर्ष करना छोड़ दिया। वह ज़मीन पर पड़ा भारी सांसें ले रहा था। खून और पसीने में लथपथ।

एक हफ़्ते बाद।

शिमला में धूप खिली थी, लेकिन हवा अभी भी ठंडी थी।

विक्रम सिंह के काले कारनामे दुनिया के सामने आ चुके थे। 'होप अनाथालय' कांड की फाइलें फिर से खुल गई थीं। मल्लिका को भी गवाही और सबूत छिपाने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया था।

कबीर जेल की कोठरी के बाहर खड़ा था। सलाखों के पीछे आर्यन बैठा था, बिल्कुल शांत।

"तुम्हें पता है," कबीर ने कहा। "मैंने तुम्हारी फाइल पढ़ी। तुम्हें वो 'काली तितली' का निशान क्यों पसंद था?"

आर्यन ने धीरे से सिर उठाया। "तितली बनने से पहले उसे एक बदसूरत कीड़े की तरह अंधेरे (कोकून) में रहना पड़ता है, कबीर। उसे दर्द सहना पड़ता है ताकि वह उड़ सके। हम सब अनाथालय के बच्चे... उस अंधेरे में थे। मैं बस उड़ना चाहता था।"

कबीर ने कुछ नहीं कहा। वह जानता था कि आर्यन मुजरिम है, लेकिन वह एक पीड़ित भी था।

"वह सिंबल..." आर्यन ने आगे कहा, "जो तुम्हारी पत्नी की हत्या वाली जगह मिला था... वह मैंने नहीं बनाया था। वह विक्रम सिंह के ग्रुप का निशान था। 'प्रोजेक्ट बटरफ्लाई'। तुम्हारी पत्नी शायद उनके किसी राज़ के करीब पहुँच गई थी।"

कबीर सन्न रह गया। 5 साल से वह जिसे ढूंढ रहा था, वह कातिल कोई एक आदमी नहीं, बल्कि यह पूरा सिस्टम था जिसे उसने आज बेनकाब किया था।

"शुक्रिया, आर्यन," कबीर ने धीमे स्वर में कहा।

कबीर जेल से बाहर निकला। बाहर राणा इंतज़ार कर रहा था। "अब क्या प्लान है सर? दिल्ली वापस जाएंगे? बहाली का आर्डर आ गया है।"

कबीर ने शिमला की पहाड़ियों को देखा। अब उसे यहाँ घुटन नहीं हो रही थी। उसका बदला पूरा नहीं हुआ था, लेकिन उसे रास्ता मिल गया था।

"हाँ राणा," कबीर ने सिगरेट जलाई और गहरा कश लिया। "चलो, दिल्ली चलते हैं। अभी बहुत सफाई बाकी है।"

उसने सिगरेट का धुआं हवा में छोड़ा, जो एक पल के लिए तितली के आकार में बना और फिर वादियों में घुल गया।

 

लेखक की ओर से (A Note from the Author)
अगर आप ये शब्द पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप कबीर के साथ इस खूनी सफर के आखिरी पड़ाव तक पहुँच गए हैं। यहाँ तक पहुँचने का एक ही मतलब है—यह कहानी आपको बहुत पसंद आई है!

अपना कीमती समय निकालकर इस कहानी को पढ़ने के लिए आपका दिल से धन्यवाद।

एक छोटी सी गुज़ारिश है—अगर इस थ्रिलर ने आपके रोंगटे खड़े किए हैं, तो इस अनुभव को अपने तक सीमित न रखें। कृपया इसे LeafyReads कम्युनिटी, दोस्तों और पढ़ने के शौकीन लोगों के साथ शेयर करें। अच्छी कहानियाँ पाठकों के प्यार से ही आगे बढ़ती हैं।

साझा करें और दूसरों को भी इस रहस्य का हिस्सा बनाएं!

— आपका लेखक

 

Keyboard Shortcuts