खामोश चीख: जुहू विला का रहस्य
By: Vikram Singh
By: Vikram Singh
मुंबई की वह रात सामान्य नहीं थी। अरब सागर में उठा चक्रवाती तूफ़ान 'वायु' अपने पूरे शबाब पर था। हवाएँ 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से इमारतों से टकरा रही थीं और बारिश इस कदर हो रही थी जैसे आसमान आज पूरी मुंबई को डुबो देने की कसम खाकर बैठा हो। समुद्र की लहरें जुहू बीच की दीवारों से सिर पटक रही थीं।
जुहू के पॉश इलाके में स्थित 'सागर विला' एक किले की तरह खड़ा था। ऊँची दीवारें, लोहे का भारी गेट और अंदर बना एक आलीशान तीन मंजिला बंगला। यह बंगला शहर के सबसे रईस और विवादास्पद हीरा व्यापारी, सेठ जगत नारायण का था।
जगत नारायण—एक ऐसा नाम, जिसके पास दौलत की कोई सीमा नहीं थी, लेकिन दोस्तों की गिनती उंगलियों पर की जा सकती थी। दुश्मनों की तादाद, अलबत्ता, अनगिनत थी।
रात के ठीक 1:45 बजे थे। बिजली कड़की और पूरे इलाके की बत्ती गुल हो गई। जनरेटर ने तुरंत काम करना शुरू किया, लेकिन विला के अंदर का माहौल रोशनी आने के बाद भी अंधेरा ही रहा।
तभी, बादलों की गरज के बीच एक और आवाज़ गूंजी। यह आवाज़ तूफ़ान की नहीं थी। यह एक इंसान की चीख थी—एक ऐसी चीख जो गले से निकलने से पहले ही घोंट दी गई हो।
विला के विशाल हॉल में खामोशी छा गई। नौकर, परिवार के सदस्य, सब अपने-अपने कमरों से बाहर निकल आए। और जब वे ग्राउंड फ्लोर पर स्थित जगत नारायण की निजी लाइब्रेरी (स्टडी रूम) में पहुँचे, तो नज़ारा देखकर सबकी रूह कांप गई।
महोगनी की बनी भारी मेज के पीछे, अपनी पसंदीदा लेदर की कुर्सी पर जगत नारायण का शरीर पड़ा था। उनकी आँखें फटी हुई थीं, जिनमें अभी भी आखिरी पल का खौफ जमा हुआ था। उनकी छाती के बाईं ओर, दिल के ठीक बीच में, एक प्राचीन खंजर (Dagger) धंसा हुआ था। यह खंजर हकीक पत्थर की मूठ वाला था, जो जगत के ही एंटीक कलेक्शन का हिस्सा था। खून की एक पतली धार उनकी सफ़ेद शर्ट से होती हुई, उस बेशकीमती ईरानी कालीन पर टपक रही थी, जिसे उन्होंने पिछले महीने ही दुबई से मंगवाया था।
बाहर तूफ़ान शोर मचा रहा था, लेकिन कमरे के अंदर मौत का सन्नाटा था।
सुबह के 3 बज रहे थे, लेकिन पुलिस सायरन की आवाज़ ने तूफ़ान के शोर को चीर दिया। इंस्पेक्टर विक्रम सिंह अपनी टीम के साथ 'सागर विला' के पोर्च में उतरे। विक्रम मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच के सबसे बेहतरीन अफसरों में गिने जाते थे। वे कम बोलते थे, लेकिन उनकी आँखें वह सब देख लेती थीं जो लोग छुपाना चाहते थे। उनकी वर्दी बारिश में भीगी हुई थी और जूतों में कीचड़ लगा था, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था—शिकारी का सुकून।
विक्रम ने हॉल में कदम रखा। वहां चार लोग मौजूद थे। चार संदिग्ध। चार कहानियां। और एक लाश।
हवलदार पाटिल ने सलाम ठोका। "सर, बॉडी को अभी तक हाथ नहीं लगाया गया है। फॉरेंसिक टीम रास्ते में है, बारिश की वजह से देर हो रही है।"
विक्रम ने सिर हिलाया और सीधे स्टडी रूम की ओर बढ़ गए। उन्होंने कमरे का मुआयना किया। कोई जबरदस्ती घुसने (Forced Entry) के निशान नहीं थे। खिड़कियाँ अंदर से बंद थीं। दरवाज़ा खुला था। इसका मतलब साफ़ था—कातिल कोई ऐसा था जिसे जगत नारायण जानते थे, या जिसे उन्होंने खुद कमरे में आने की इजाज़त दी थी।
लाश के पास जाकर विक्रम ने बारीकी से देखा। जगत के हाथ कुर्सी के हत्थों पर जकड़े हुए थे। उन्होंने संघर्ष नहीं किया था। मौत अचानक आई थी। मेज पर एक व्हिस्की का गिलास रखा था जो आधा खाली था। पास ही एक खुली हुई डायरी पड़ी थी और एक महंगा फाउंटेन पेन, जिसका ढक्कन खुला हुआ था।
विक्रम ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और पेन को उठाया। निब अभी भी गीली थी। यानी मौत से ठीक पहले जगत कुछ लिख रहे थे। विक्रम ने डायरी की ओर देखा। पन्ना खाली था। लेकिन उस पन्ने के ठीक ऊपर वाला पन्ना फाड़ा गया था। फटे हुए पन्ने के किनारे बहुत बेतरतीब थे, जैसे किसी ने हड़बड़ाहट में उसे नोचा हो।
"हम्म..." विक्रम बुदबुदाए।
उन्होंने मुड़कर उन चार लोगों को देखा जो हॉल में सहमे हुए बैठे थे। विक्रम जानते थे कि आज रात का सच इन्हीं चारों के बीच कहीं दफन है।
विक्रम हॉल में वापस आए और एक कुर्सी खींचकर उन सबके सामने बैठ गए। उन्होंने अपनी गीली टोपी उतारकर मेज पर रखी और चारों को एक-एक करके स्कैन किया।
माया नारायण (पत्नी): उम्र लगभग 32 साल। जगत नारायण की दूसरी पत्नी। वह एक ज़माने में मॉडल हुआ करती थी। उसकी सुंदरता अभी भी बरकरार थी, लेकिन आँखों के नीचे काले घेरे और चेहरे पर एक अजीब सी कठोरता आ गई थी। वह सोफे के कोने में बैठी थी, उसके हाथ कांप रहे थे और वह लगातार एक बिना जलाई हुई सिगरेट को अपनी उंगलियों के बीच घुमा रही थी। जगत नारायण 60 साल के थे। यह बेमेल जोड़ा हमेशा गॉसिप मैगज़ीन की सुर्खियों में रहता था।
आकाश नारायण (सौतेला बेटा): उम्र 26 साल। जगत की पहली पत्नी का बेटा। वह नशे में धुत लग रहा था। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और आँखों में नफरत साफ़ झलक रही थी—न सिर्फ पुलिस के लिए, बल्कि उस मरे हुए आदमी के लिए भी जो उसका पिता था। आकाश अपनी अय्याशियों और जुए की लत के लिए बदनाम था।
मिस्टर राजीव मेहरा (बिजनेस पार्टनर): उम्र 55 साल। सूट-बूट में तैयार, लेकिन टाई ढीली की हुई। वह जगत के बचपन के दोस्त और बिजनेस पार्टनर थे। उनके चेहरे पर पसीना था, जो शायद गर्मी से नहीं, बल्कि डर से था। वे बार-बार अपनी घड़ी देख रहे थे।
रघु काका (पुराना नौकर): उम्र 65 साल। झुकी हुई कमर, सफ़ेद बाल और चेहरे पर वफादारी की लकीरें। रघु पिछले 40 सालों से इस घर में था। उसने जगत को जवान होते, अमीर होते और अब मरते देखा था। वह कोने में खड़ा था, उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे।
विक्रम ने खामोशी तोड़ी। "मिस्टर जगत नारायण का कत्ल हुआ है। और कत्ल आप में से ही किसी एक ने किया है। क्योंकि इस तूफ़ान में न कोई बाहर से आ सकता था, और न कोई बाहर जा सकता था।"
आकाश हंसा। एक रूखी, कड़वी हंसी। "तो आप क्या चाहते हैं इंस्पेक्टर? हम लॉटरी निकालें कि किसने बुड्ढे को टपकाया? वैसे, जिसने भी किया, अच्छा ही किया। दुनिया का बोझ हल्का हो गया।"
"आकाश!" माया ने उसे डांटा। "वह तुम्हारे पिता थे।"
"सौतेले पिता, माया डार्लिंग। सौतेले," आकाश ने ज़हर उगला। "और तुम भी कोई सती-सावित्री नहीं हो। मुझे पता है तुम कितनी खुश हो।"
"शांत हो जाइए," विक्रम की आवाज़ में लोहे जैसी सख्ती थी। "एक-एक करके बात करते हैं।"
संदिग्ध 1: माया नारायण
विक्रम माया को साथ वाले कमरे में ले गए। "मिसेज नारायण, आप आखिरी बार अपने पति से कब मिली थीं?"
माया ने एक गहरी सांस ली। "रात के खाने पर। करीब 9 बजे। उन्होंने मुझसे कहा कि वे स्टडी में काम करेंगे और कोई उन्हें डिस्टर्ब न करे। मैं अपने कमरे में चली गई। मुझे माइग्रेन था, तो मैंने दवाई ली और लेट गई।"
"क्या आपके और मिस्टर जगत के बीच सब ठीक था?" विक्रम ने सीधा सवाल दागा।
माया की आँखों में एक पल के लिए डर दिखा। "कैसा सवाल है यह? हर पति-पत्नी में झगड़े होते हैं।"
"मुझे पता चला है कि आपका किसी और के साथ अफेयर चल रहा था और जगत सर आपको तलाक देने वाले थे। बिना एक भी पैसा दिए," विक्रम ने अंधेरे में तीर चलाया।
माया का चेहरा पीला पड़ गया। वह हकलाने लगी। "यह... यह झूठ है। हाँ, वह मुझे तलाक देना चाहते थे, लेकिन इसलिए नहीं कि मेरा अफेयर था। बल्कि इसलिए क्योंकि मैं उनकी गुलाम बनकर नहीं रहना चाहती थी। वह एक कंट्रोल-फ्रीक थे, इंस्पेक्टर। वह मुझे सांस भी अपनी मर्जी से लेने देते थे। लेकिन मैंने उन्हें नहीं मारा। अगर मैं मारती, तो ऐसे मारती कि पुलिस को कभी पता नहीं चलता।"
संदिग्ध 2: आकाश नारायण
आकाश अभी भी लड़खड़ा रहा था। विक्रम ने उसे पानी का गिलास दिया। "आकाश, तुम्हारे ऊपर बाजार का कितना कर्जा है?"
आकाश ने पानी का गिलास मेज पर पटक दिया। "सीधे पॉइंट पर आओ। हाँ, मुझ पर 5 करोड़ का कर्जा है। और हाँ, वो बुड्ढा आज रात अपनी वसीयत बदलने वाला था। उसने मुझे धमकी दी थी कि वह मुझे अपनी फूटी कौड़ी भी नहीं देगा।"
"तो तुमने उसे मार दिया ताकि वसीयत न बदल सके?" विक्रम ने पूछा।
"मैं उसे मारना चाहता था," आकाश ने कबूला। "मैं कसम खाता हूँ, मैं उसे अपने हाथों से गला घोंटकर मारना चाहता था। मैं उसके कमरे की तरफ गया भी था। करीब 1 बजे। लेकिन..."
"लेकिन क्या?"
"लेकिन मैं दरवाज़े पर रुक गया। अंदर से आवाज़ें आ रही थीं। वह किसी से बात कर रहा था। बहुत गुस्से में था। चिल्ला रहा था—'गद्दार! मैंने तुझे पाला और तूने मुझे डसा?' मुझे लगा शायद मेहरा अंकल अंदर हैं। मैं डर गया। मैं कायर हूँ इंस्पेक्टर, कातिल नहीं। मैं वापस अपने कमरे में आ गया और शराब पीने लगा।"
संदिग्ध 3: राजीव मेहरा
राजीव मेहरा बहुत घबराए हुए थे। पसीना पोंछते हुए उन्होंने कहा, "इंस्पेक्टर, मेरा और जगत का झगड़ा हुआ था। यह सच है। हमारी कंपनी डूब रही है और जगत अपने शेयर बेचकर निकलना चाहता था। अगर वह ऐसा करता, तो मैं सड़क पर आ जाता। मैं उसे समझाने आया था।"
"क्या आप 1 बजे उसके कमरे में थे?"
"नहीं! मैं 11 बजे ही उनसे मिल लिया था। उन्होंने मेरी एक न सुनी। उन्होंने मुझे धक्के देकर कमरे से निकाल दिया। मैं गेस्ट रूम में था, अपने वकील को फोन करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन नेटवर्क नहीं था।"
"आकाश ने कहा उसने किसी को अंदर 'गद्दार' कहते हुए सुना।"
मेहरा चुप हो गए। फिर बोले, "जगत सबको गद्दार ही समझता था। शायद वह फोन पर किसी से बात कर रहा हो।"
संदिग्ध 4: रघु काका
रघु काका का बयान सबसे छोटा था। "साहब, मैं तो बस एक नौकर हूँ। जगत बाबू मेरे लिए भगवान थे। उन्होंने मुझे तब सहारा दिया जब मेरे पास कुछ नहीं था। मैं तो किचन में उनके लिए हल्दी वाला दूध बना रहा था। जब उनकी चीख सुनी, तो दूध का गिलास मेरे हाथ से गिर गया। मैं दौड़कर गया, लेकिन तब तक..." रघु फफक कर रो पड़ा।
सुबह के 5 बज चुके थे। विक्रम वापस स्टडी रूम में आए। उनके दिमाग में आकाश की बात गूंज रही थी—"मैंने तुझे पाला और तूने मुझे डसा?"
यह लाइन जगत ने किससे कही होगी? आकाश सौतेला बेटा था—उसे 'पाला' जा सकता है। माया पत्नी थी—यह लाइन उस पर फिट नहीं बैठती। मेहरा दोस्त था—'पालना' शब्द दोस्त के लिए अजीब है। रघु नौकर था—वह 40 साल से वहां था। क्या उसे 'पाला' गया था?
विक्रम की नज़र फिर से उस डायरी और फाउंटेन पेन पर गई। उन्होंने फॉरेंसिक टीम के इंचार्ज डॉ. सालुंके को बुलाया। "डॉक्टर, मुझे जानना है कि उस फटे हुए पन्ने पर क्या लिखा था। पेन का दबाव (impression) अगले पन्ने पर जरूर आया होगा।"
डॉ. सालुंके ने अपनी किट से एक विशेष पाउडर और इलेक्ट्रोस्टैटिक डिटेक्शन डिवाइस (ESDA) निकाला। कुछ ही मिनटों की मशक्कत के बाद, खाली पन्ने पर उभरे हुए अक्षर पढ़ने लायक हो गए।
विक्रम ने मैग्निफाइंग ग्लास से पढ़ा। वहां सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी: "आज रात 10 करोड़ का हेरा-फेरी का सच सामने आ गया। रघु, तूने मेरे भरोसे का खून किया है। कल सुबह तुझे पुलिस..."
लिखावट यहीं रुक गई थी।
विक्रम के दिमाग में बिजली कौंधी। उन्होंने तुरंत लाश के हाथों को देखा। जगत के बाएं हाथ की तर्जनी (Index finger) पर नीली स्याही का एक बहुत हल्का, न के बराबर दिखने वाला धब्बा था।
विक्रम मुस्कुराए। पहेली सुलझ चुकी थी।
विक्रम ने सभी को हॉल में इकट्ठा किया। बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी, लेकिन विला के अंदर का तापमान बढ़ने वाला था।
"मिस्टर जगत नारायण की हत्या पैसों के लिए नहीं हुई," विक्रम ने शुरू किया। "यह हत्या एक ऐसे राज़ को छुपाने के लिए हुई जो आज रात खुलने वाला था।"
उन्होंने आकाश की ओर देखा। "आकाश, तुमने सच कहा था। तुमने अपने पिता को चिल्लाते हुए सुना था। लेकिन वह मेहरा जी पर नहीं चिल्ला रहे थे।"
फिर उन्होंने माया को देखा। "माया जी, आप आज़ाद हैं। आपका पति आपको कुछ नहीं देने वाला था, लेकिन अब उसकी मौत के बाद आप काफी अमीर हो जाएंगी।"
अंत में, विक्रम की नज़रें रघु काका पर जाकर टिक गईं। वह बूढ़ा नौकर अब भी सिर झुकाए खड़ा था।
"रघु," विक्रम ने आवाज़ में नरमी और सख्ती दोनों मिलाकर कहा। "तुमने पन्ना तो फाड़ दिया, लेकिन लिखावट का दबाव मिटाना भूल गए।"
रघु ने चौंककर ऊपर देखा। उसकी आँखों में अब आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सा खालीपन था।
"जगत नारायण को पता चल गया था कि तुम पिछले कई सालों से उनके बिजनेस अकाउंट्स और घर की तिजोरी से धीरे-धीरे पैसा चुरा रहे थे। 10 करोड़ रुपए। एक बहुत बड़ी रकम," विक्रम ने खुलासा किया। "वह डायरी में यही लिख रहे थे। उन्होंने तुम्हें बुलाया होगा, या शायद तुम दूध लेकर वहां गए होगे। उन्होंने तुम्हें बताया कि वे तुम्हें पुलिस के हवाले करने वाले हैं। 'मैंने तुझे पाला और तूने मुझे डसा'—यह लाइन उन्होंने तुम्हारे लिए कही थी, क्योंकि तुम उनके परिवार जैसे थे।"
विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया। "तुमने देखा कि तुम्हारा मालिक तुम्हारा कच्चा-चिट्ठा लिख रहा है। तुम डर गए। तुम जानते थे कि एंटीक खंजर कहां रखा है। तुमने मौका नहीं गंवाया।
तुमने उनका खून कर दिया। फिर तुमने डायरी का वह पन्ना फाड़ दिया जिसमें तुम्हारा नाम लिखा था। लेकिन जल्दबाजी में, जब तुमने डायरी छीनी, तो जगत की उंगली उस पेन की गीली स्याही पर लग गई जो उन्होंने अभी-अभी छोड़ा था।"
हॉल में सन्नाटा था। सब रघु की ओर देख रहे थे। वह वफादार नौकर, जो घर का हिस्सा माना जाता था।
"लेकिन इंस्पेक्टर साहब," रघु ने कांपती आवाज़ में कहा, "मेरे पास सबूत क्या है? यह तो आप कहानी बना रहे हैं।"
विक्रम ने अपनी जेब से एक प्लास्टिक का बैग निकाला। उसमें वह खंजर था। "रघु, फॉरेंसिक साइंस बहुत आगे बढ़ चुका है। तुमने खंजर की मूठ को पोंछ दिया था, यह सोचकर कि उंगलियों के निशान मिट गए। लेकिन खंजर के फलक (Blade) और हत्थे के बीच की जो दरार है, वहां तुम्हारा पसीना और त्वचा के सूक्ष्म कण (Skin cells) मिले हैं। और सबसे बड़ी बात... तुम्हारे क्वार्टर की तलाशी ली जा रही है। मुझे यकीन है कि वह फाड़ा गया पन्ना या उसकी राख वहां जरूर मिलेगी।"
रघु के घुटने जवाब दे गए। वह ज़मीन पर गिर पड़ा। "मैंने... मैंने जानबूझकर नहीं किया साहब," वह गिड़गिड़ाया। "मुझे पैसों की जरूरत थी। मेरे बेटे का इलाज... जुआ... कर्जा... सब उलझ गया था। जगत बाबू ने मुझे रंगे हाथों पकड़ लिया था। वह कह रहे थे कि मुझे जेल भेजेंगे। मैं डर गया साहब। 40 साल की सेवा... सब मिटटी में मिल जाती। मैंने बस उन्हें चुप कराना चाहा था।"
रघु का कबूलनामा हॉल में गूंजता रहा।
पुलिस रघु को हथकड़ी लगाकर ले जा रही थी। आकाश एक कोने में खड़ा होकर यह सब देख रहा था। उसकी आँखों से नफरत अब गायब हो चुकी थी, उसकी जगह एक अजीब सी शून्यता ने ले ली थी। जिस पिता को वह राक्षस समझता था, उसकी जान उस आदमी ने ली जिसे उसने हमेशा 'काका' कहा था।
माया सोफे पर बैठी थी। अब वह आज़ाद थी, दौलतमंद थी, लेकिन अकेली थी। उसने अपनी सिगरेट जलाई और धुएं को हवा में उड़ा दिया।
इंस्पेक्टर विक्रम अपनी जीप की ओर बढ़े। बारिश अब पूरी तरह रुक चुकी थी। पूरब में हल्का सा उजाला हो रहा था। मुंबई फिर से जाग रही थी, अपनी रफ़्तार पकड़ने के लिए।
हवलदार पाटिल ने पूछा, "सर, आपको कैसे यकीन था कि पन्ना रघु के कमरे में मिलेगा?"
विक्रम ने मुस्कुराते हुए जीप स्टार्ट की। "मुझे यकीन नहीं था, पाटिल। मैंने बस दांव खेला। उसे 'ब्लफ' किया। अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, जब उसे लगता है कि उसका राज खुल गया है, तो वह टूट जाता है। और रघु कोई पेशेवर कातिल नहीं था, वह बस एक डरा हुआ इंसान था।"
जीप 'सागर विला' के गेट से बाहर निकल गई, पीछे छोड़ते हुए एक ऐसा घर जो अब कभी पहले जैसा नहीं होने वाला था। जगत नारायण की दौलत, उनकी रंजिशें और उनके राज—सब उसी बंगले में कैद रह गए। बस एक सच बाहर आया था, और वह सच खंजर से भी ज्यादा धारदार था।
विश्वास का कत्ल, इंसान के कत्ल से ज्यादा दर्दनाक होता है।
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