भिखारी कौन ?
By: अजय राज शेखावत
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By: अजय राज शेखावत
ट्रैन आने का समय हो चला है। राम्या सीधे टिकट खिड़की पर पहुँचती है। "भैया जयपुर का टिकट कितने का है।" राम्या ने पूछा। दो सौ पांच सामने से आवाज आई। एक मिनिट राम्या ने ये कहकर अपने बैग से अपना पर्स निकालने के लिए बैग खोलती है। लेकिन पर्स वहाँ नहीं मिलता। शायद कपड़ो के नीचे दब गया होगा, राम्या ने अपने मन में सोचते हुए वहाँ टटोला। जब वहाँ भी नही मिला तो उसने पूरा बैग छान मारा। अब उसके होश फाख्ता हो गए। पर्स चोरी हो गया था।
अब उसे याद आया कि यहां तक आने के लिए जिस बस में वो चढ़ी थी। उसमे बहुत भीड़ थी। अब उसके समझ में आ गया था। जब उसने किराया दिया था और पर्स बैग में रखा था तो एक आदमी बैग को घूर घूर के देख रहा था। पक्का उसी का काम था। पर अब पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। उसे पैसो का दुःख नहीं था,उसका मोबाइल और डेबिट कार्ड भी उसी में थे।
अब उसने वहाँ खड़े लगभग हर व्यक्ति से अपनी रामकहानी बयाँ की और मदद माँगी। क्योकि गाड़ी किसी भी वक्त आ सकती थी। लेकिन किसी ने मदद नहीं कि पर मुफ़्त के प्रवचन जरूर दिए।
एक ने तो हद कर दी और बोला की," लगता है भीख मांगने का नया तरीका है।" थक हार कर बेचारी टिकट खिड़की पर गई और उस व्यक्ति को अपनी समस्या बताई और मदद के लिए हाथ जोड़े। वह व्यक्ति तंज मारते हुए बोला,"मैडम यहाँ हर दूसरे आदमी का पर्स खो जाता है और मै अगर सबका संकट मोचक बन गया ना तो मेरे बीवी बच्चे सड़को पे भीख मांगेंगे।
पैसे है तो दीजिये।" उम्मीद की आख़िरी किरण भी टूट गई। बेचारी पास पड़ी बेंच पे असहाय होकर बैठ गई।
अभी उसको बैठे हुये कुछ समय ही बीता था। उसके पास एक भिखारिन आई और बोली," बीबीजी बहुत देर से देखरी मैं तुमको।
क्या हुआ।" राम्या उसे देखकर थोड़ा सा डर कर सहम सी गईं। "अरे डरती काई कु है। मै बाहर से मैली है रे, ये भीड़ की तरह अंदर से नही । बोलना क्या बात हुई ।"भिखारिन ने प्यार से पूछा।
अब राम्या थोड़ी सहज हुई और लाचारी से बोली," मै यहाँ एग्जाम देने आईं थी कल। सुबह होटल से निकल कर एग्जाम देने गई और जब वापस यहाँ आ रही थी तो बस में किसी ने पर्स मार लिया। अब टिकिट तक के लिए पैसे नही है और मेरी फूटी किस्मत ये की मै किसी को भी नही जानती यहाँ।"
"यहाँ दिल्ली में एक से एक चोर है बीबीजी। अरे अखियां से सुरमा निकाल ले पतो भी ना लगे। तू डर ना ये ले तेरा टिकिट।" भिखारिन ने टिकिट देते हुए कहा।
राम्या ने जैसे ही टिकिट हाथ मे लिया उसकी खुशी का ठिकाना नही रहा।
उसे लगा कि जैसे संसार की सबसे कीमती चीज उसके हाथ में है। उसके आंसुओ ने आँखों का साथ छोड़ दिया था। अपने आप को संभालते हुए उसने उत्सुकता से पूछा कि,"आपको क्या पता की मै जयपुर जा रही हूँ। आपने कब लिया ये। मै कैसे आपको धन्यवाद दूँ। "
"जब तू उस हलकट से टिकिट मांग रही थी ना, तो तेरा दुखड़ा नही देख सकी मै। तो ले ली मै तेरा टिकिट। वो देख तेरी रेलगाड़ी भी आ गई।" भिखारिन आती हुई ट्रैन की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"आपका ये अहसान पता नहीं मै कैसे चुका पाऊँगी।" राम्या हाथ जोड़कर बोली। "कोई बात नही बीबीजी। ये लो कुछ पैसे रख लो आगे काम आयेगे।"भिखारिन ने जबरदस्ती उसके हाथ में कुछ नोट देते हुए कहा। "नही मै नही रख सकती। आपने बहुत मदद कर दी है।" राम्या ट्रैन में चढ़ते हुए बोली।
अब वो भिखारिन गुस्से से बोली," जिद मत करो बीबीजी नही रखना है तो मेरा टिकिट भी वापस दे दो।" अब राम्या को वो रखने ही पड़े। "रही बात बीबीजी अहसान की, आप भी कभी किसी दिन किसी लाचार की यूँ ही मदद कर दियो।" भिखारिन ने मुस्कुराते हुए कहा।
ट्रैन ने जाने का सिग्नल दे दिया। अब राम्या से रहा न गया। उसने ट्रैन से उतर कर कस के उस भिखारिन को गले लगा लिया औऱ मन ही मन बोली,असली भिखारी तो ये तमाशा देखने वाली भीड़ है। तुम तो मेरे लिए भगवान बन कर आई हो।
"अरे ये क्या कर रही है बीबीजी रेलगाड़ी चल पड़ी है।" भिखारिन हड़बड़ाहट में बोली। राम्या दौड़कर ट्रैन में चढ़ गई और तब तक उसे देखती रही जब तक की वो आंखों से ओझल ना हो गईं।