श्रीमद्भागवत गीता की 18 ज्ञान की बातें
By: Shivam SSV
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By: Shivam SSV
गीता की 18 ज्ञान की बातें- श्रीमद्भगवत गीता का उद्गम स्थान महाभारत का रणक्षेत्र है, जहां पर भगवान श्रीकृष्ण ने पांडु पुत्र अर्जुन गीता का उपदेश दिया था, जिससे उनके ज्ञान चक्षु खुले थे और वह युद्ध क्षेत्र मे आगे बढ़े थे। इसी प्रकार आज के मनुष्य के लिए भी ये उपदेश अमृत समान है।
इन उपदेशों का सार 18 बातों मे समाहित किया गया है, जिन्हे साधारण मनुष्य भी अपने जीवन में अनुसरित कर सकता है, और गीता में बताई गयी बुराइयों से मुक्ति मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।
(1) : सुख एवं आनंद मनुष्य के भीतर ही निवास करते हैं। परंतु मनुष्य उसे स्त्री में, घर में और बाहरी सुख प्राप्ति के लिए ढूंढ रहा है।
(2) : श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवान उपासना केवल शरीर से ही नहीं बल्कि मन से भी करना चाहिए। ईश्वर का वंदन उन्हें प्रेम-बंधन में बांधता है।
(3) : मनुष्य की वासना ही उसके पुनर्जन्म का कारण होती है।
(4) : मनुष्य इंद्रियों के अधीन है इसलिए उसके जीवन में विकार और परेशानियां आती हैं।
(5) : मनुष्य के अंदर धैर्य, सदाचार, स्नेह और सेवा जैसे गुण सत्संग के बिना नहीं आते हैं।
(6) : श्रीकृष्ण कहते हैं जिस प्रकार शरीर से वस्त्र मैल होने पर बदलते हैं ठीक उसी प्रकार मन में यानी ह्रदय में मैले होने से उसे निकाल देना चाहिए।
(7) : जवानी में जिसने ज्यादा पाप किए हैं उसे बुढ़ापे में नींद नहीं आती है, उसे वह पश्चाताप में बिताते हैं।
(8) : भगवान ने जिसे संपत्ति दी है उसे गाय रखकर सेवा करनी चाहिए इससे भगवान प्रसन्न होते हैं ।
(9) : जुआ, मदिरा पान, परस्त्री गमन (अनैतिक संबंध), हिंसा, असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता इन सब में कलियुग का वास है इसलिए इसका और एक नाम है घोर कलयुग ।
(10) : अधिकारी शिष्य को यानी जो ज्ञान प्राप्त करने में परिश्रम करते हैं उसे सद्गुरु (अच्छा गुरु) अवश्य मिलता है।
(11) : भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को अपने हृदय को बार-बार समझने की कोशिश करनी चाहिए, ईश्वर के सिवाय उसका कोई नहीं है। साथ ही यह विचार करना चाहिए कि उसका कोई नहीं है इस ब्रह्मांड में भी, जो उसका साथ देगा।
(12) : भोग में क्षणिक (क्षण भर के लिए) सुख प्राप्त होता है। साथ ही त्याग में स्थायी आनंद है।
(13) : श्रीकृष्ण कहते हैं कि सत्संग ईश्वर की कृपा से मिलता है। परंतु कुसंगति में पड़ना मनुष्य के अपने ही विचारों के कारण होता है।
(14) : लोभ और मोह माया (किसी से अधिक लगाव) पाप के माता-पिता कहे जाते हैं। साथ ही लोभ पाप का बाप ही है।
(15) : श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्त्री का धर्म है कि रोज तुलसी और पार्वती का पूजन करें इससे उनकी सुख समृद्धि हमेशा बने रहते हैं ।
(16) : मनुष्य को अपने मन और बुद्धि पर हमेशा विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये बार-बार मनुष्य को दगा देते हैं। खुद को निर्दोष मानना बहुत बड़ा गुनाह साबित होता है।
(17) : पति-पत्नी पवित्र रिश्ता बनाए रखने से भगवान पुत्र के रूप में उनके घर आने की इच्छा रखते हैं।
(18) : भगवान इन सभी कसौटियों पर कसकर, जांच-परखकर ही मनुष्य को अपनाते हैं। इसलिए मन में गलत विचार नहीं रखना चाहिए सदैव आप किसी के साथ प्रेम भाव से रहना चाहिए।

श्रीमद्भगवत गीता की ये 18 बातें आपके जीवन में ईर्ष्या, मोह, माया, घृणा, लालच एवं काम वासना इत्यादि बुराइयों से मुक्ति प्रदान करेंगी, अगर इन्हें आप अपने जीवन मे अपनाते हैं।